बचना आपको स्वयं को हैं, बचने के लिए मरने की सिद्धता चाहिए होती है।

20 वर्ष पुरानी बात है। एक नए स्थान पर हमने संघ की शाखा शुरू की। एक मंदिर था जो कस्बे से थोड़ा दूर निर्जन स्थान में था। उसके पास वाली खाली जगह पर शाखा लगती थी। शाम को एक घण्टा पहले घर से निकलते, फिर सम्पर्क करते हुए लगभग 6 से 7 बजे शाखा लगती। दौड़, व्यायाम, खेल, दण्ड अभ्यास इत्यादि के बाद प्रार्थना और गीत आदि होते। दो महीने में संख्या 50 तक पहुंच गई।
मंदिर में दो रिटायर्ड वृद्ध आते थे शाम के समय। थोड़ा आरती की फॉरमल्टी करते और फिर सीढ़ियों पर बैठकर दो घण्टे कोई गपशप करते। दोनों ही खूसट और भयंकर सेक्युलर थे। घर से भी उपेक्षित थे। जवानी में सरकार का अभिन्न अंग रहे थे और सारे दांवपेंच जानने, दुनिया भर का माल कूटने के बाद उम्र के इस पड़ाव पर भगवान की चापलूसी करने और घर के कर्कश वातावरण से बचने को यहाँ आते थे।
इन दो के अलावा मंदिर में आज तक कोई नहीं आता था।
क्या हो गया है आज की युवा पीढ़ी को…? अक्सर वे घण्टों घण्टों इस पर उपदेश देते।
चूंकि उन्हें फ्री फोकट का श्रोता मैं ही मिला था तो वे “नई पीढ़ी में घटते आध्यात्मिक मूल्यों” पर मुझे बहुत सुनाते थे।
सच्चाई यह थी कि यह मैं ही था जो उनकी बकवास सुने जा रहा था, दूसरा होता तो कब का भाग जाता।

लेकिन ज्यों ही शाखा लगी, विकिर के बाद सभी स्वयंसेवक मंदिर की आरती भी करते, घण्टा घड़ियाल बजने लगे और पूरे वातावरण में रौनक आ गई। कभी कभी ढोलक मंजीरे लेकर जम जाते, सुंदरकांड और जगराते भी कर देते।
बूढ़ों की आँखों में चमक आ गई थी। इतने श्रद्धालु, ये जयजयकार, तरुण युवाओं की अनुशासित उछलकूद में उन्हें कोई फसल नजर आने लगी।
वे मंदिर के बहाने हम पर धौंस भी जमाने लगे। शाखा के बीच में से ही पुकारते “छोड़ो ये खेल वगैरह, आओ, आजाओ। आरती का समय हो गया!”
उन्होंने आरती का समय जानबूझकर जल्दी रख दिया क्योंकि उन्हें डेयरी से दूध लाने का काम घर पर मिल गया था।
लेकिन स्वयंसेवकों ने तो यही तय किया कि शाखा अपने तरीके से और तय समय पर चलेगी।
हालांकि बाद में वे समझ गए कि शाखा वालों को अपने तरीके से नहीं चलाया जा सकता।
उन दोनों महानुभावों के मंदिर के आस पास की जमीन पर कब्ज़ा था और वहाँ कोई विवाद भी था। उनकी कब्जाई जमीन पर दूसरों ने पत्थर डाल कर कब्जा कर दिया था और अब वे चाहते थे कि इस मंदिर या शाखा में आने वालों के माध्यम से उसे छुड़ाया जाय।
उन्होंने इसके लिए बहुत दांव पेंच लगाए, आरम्भ में तो वे शाखा को कोई घर काव्यक्तिगत गैंग मानकर ऑर्डर देते थे, जब दाल नहीं गली तो दुत्कार धुत्कार, और वह भी नहीं हुआ तो ध्वज प्रणाम, प्रार्थना वगैरह भी करने लगे।
लेकिन उन्होंने कभी भी देशभक्ति या धर्म रक्षण की न कोई बात की न ही सहयोग दिया।
हर समय रण्डी रोना करते। और बाजार में जाकर इस बात का ढिंढोरा भी पीटते कि ये शाखा वाखा कुछ नहीं, किसी काम की नहीं, इनसे कुछ नहीं होगा। जितनी संख्या शाखा में होती, उतने तो उनके कुटुंब सदस्य और पोते पोतियां ही थे, बड़ा लम्बा परिवार था लेकिन उनकी इच्छा थी कि जमीन का कब्जा शाखा वाले छुड़ाएं।

पूज्य डॉक्टर हेडगेवार जी के समय की एक घटना है, एक वकील साहब इसलिए शाखा आते थे कि उससे उनके व्यवसाय में तरक्की हो।
अन्त में, मैं स्पष्ट कर दूं कि शाखा एक साधना है, उसका आपकी सुरक्षा, संरक्षा से सीधा संबंध नहीं है, यदि आप इसलिए शाखा आते हैं कि इससे आप सुरक्षित रहेंगे, तो हो सकता है ऐसा हो और नहीं भी हो। हो सकता है कि आप नए जुड़े हैं, जानकर आपके शत्रु आपका वध कर दें कि यह शाखा क्यों जा रहा है?
लेकिन अधिक संभावना यही है कि आप बच जाएंगे।
आत्मरक्षा और स्वयं के परिवार की सुरक्षा नितांत व्यक्तिगत जिम्मेदारी है। ऐसा नहीं हो सकता कि आप तो बेडरूम में विलासिता की चीज इकट्ठा करें और जब आपके घर पर हमला हो तो शाखा वाले आकर बचा जाएं।
बचा तो आपको पुलिस भी नहीं सकती। वह स्वयं दंगाइयों के हाथों पिट रही है।
मोदी, योगी को गरियाने वाले ध्यान दें कि आपके इन व्यंग्य वचनों से आहत होकर, कोई मोदी योगी, आपके घर आपको बचाने नहीं आने वाला।
इस देश के तीन प्रधानमंत्रियों की हत्याएं हो चुकी हैं, तो सुरक्षित तो वे भी नहीं है, आपको क्या बचा पाएंगे।
बचना आपको स्वयं को हैं। बचने के लिए मरने की सिद्धता चाहिए होती है।
जिंदा रहने के टिप्स आप मुझसे इनबॉक्स में मांग सकते हैं।

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