दंगों पर सेक्युलर लेखकों का रण्डी रोना।

दंगों पर सेक्युलर लेखकों का रण्डी रोना।
वैसे ये सेक्युलर नहीं बल्कि मुस्लिमपरस्त और हिन्दू द्वेषी लोग हैं जो इधर उधर से चुग्गा मिलने पर मालिक के अनुकूल चहचहाते हैं।
देश में हो रहे साम्प्रदायिक दंगों पर इनके तर्क कुछ इस प्रकार है।

पकत्थरबाज दंगाई
  1. नरेन्द्र मोदी के आने के बाद साम्प्रदायिक दंगे हुए।
    — सच्चाई यह है कि 2014 के बाद दंगे लगभग बन्द हो गए थे। हाल ही में ये दंगे हिन्दू त्यौहारों पर मुसलमानों के पथराव से शुरू हुए और देश के कई भागों में हुए।
  2. साम्प्रदायिक हिंसा हिन्दू और मुस्लिम दोनों तरफ से होती है।
    — सच्चाई यह है कि सभी हिंसाओं, पथराव की शुरुआत मुसलमानों ने की। मस्जिदों के आगे की, अल्लाहो अकबर के नारे बोलकर की। सर्वत्र पिटने वाले हिन्दू और पीटने वाले मुस्लिम ही क्यों है?
  3. साम्प्रदायिक दंगे आरएसएस करवा रहा है, वह कुछ नासमझ मुस्लिमों को हायर कर दंगों की शुरुआत करवाता है।
    — यदि ऐसा है मुस्लिम युवा हायर क्यों हो जाते हैं। उन हायर्ड मुस्लिमों को बचाने के लिए कांग्रेस और मुस्लिम ही क्यों पक्ष में खड़े हो जाते हैं। अगर वे मुस्लिम बहक जाते हैं तो गिरफ्तार होने पर आरएसएस के उन लोगों के नाम क्यों नहीं बताते जिन्होंने उन्हें सिखाया है। यदि वे आरएसएस के लोग हैं तो पकड़े जाने के बावजूद मुस्लिम परस्त जिहादी बयान क्यों देते हैं?
  4. मुसलमान अशिक्षित हैं।
    —- गोरखपुर मठ में गुडागर्दी करते पकड़ा गया मुर्तजा केमिकल इंजीनियर था। अधिकांश बड़े मुस्लिम नेता, मौलाना, और आतंकवादी सभी उच्च शिक्षित और टेक्नोलॉजी के जबरदस्त जानकार लोग हैं। पकड़े जाने वाले सभी मुस्लिम पढ़े लिखे हैं।
  5. साम्प्रदायिक दंगे राजनीति की देन है।
    — कौन कर रहा है राजनीति, ऐसा खुला नहीं लिखते। सच्चाई यह है कि सेक्युलर दल मुस्लिम परस्त तो हैं ही, वे मुसलमानों से ब्लैकमेल भी हो रहे हैं, वे न कुछ कह सकते हैं न कर सकते हैं। कई बार तो इनको मुस्लिम नेता ही चला रहे होते हैं। जबकि इसके उलट, बीजेपी न हिंदुओं के दबाव में है न ही उसे हिन्दू अपने हित के अनुरूप चला पा रहा है। जिस दिन हिन्दू ने बीजेपी को अपने अनुसार किया, यदि ऐसा हुआ, तो देश में एक भी दंगा नहीं होगा। फिर इन लेखकों के लेख की भी जरूरत नहीं रहेगी।
  6. साम्प्रदायिक हिंसा से बीजेपी को फायदा हो रहा है।
    —- असल में सभी गैर बीजेपी दल घनघोर हिन्दू विरोधी आचरण कर रहे हैं, वे बढ़ती मुस्लिम गुंडागर्दी के आगे समर्पण कर उल्टा हिंदुओं को ही प्रताड़ित कर रहे हैं, यह स्पष्ट दीख रहा है तो हिंदुओं का उनसे मोहभंग हुआ है और ऑप्शन के तौर पर वे बीजेपी के साथ दिखते हैं। लेकिन इन लेखकों के आका, ऐसी नौबत ही क्यों आने दे रहे हैं?
    दंगा करे मुस्लिम, पिटे हिन्दू, दोषारोपण बीजेपी पर, इस विचित्र विरोधाभास को कोई अंधा भी पहचान ले पर इन्हें समझ नहीं आ रहा।
  7. मुसलमान अल्पसंख्यक हैं अतः उनमें असुरक्षा की भावना है।
    — देश में अल्पसंख्यक तो पारसी है, कभी किसी के मन में असुरक्षा भावना नहीं आयी। 30 से 40 करोड़ आक्रामक मुस्लिम यदि अल्पसंख्यक हैं, और उधर हिन्दू विभिन्न जातीय समूहों में बंटा है, तो इतने बड़े समूह में हिंदुओं की एक भी जाति/समूह नहीं है। लेखकों का ही केलकुलेशन माना जाए, जैसा कि वे जाम्भोजी, महाराणा प्रताप और तेजाजी का नाम लेकर इनका जातीयकरण करते हैं तो इस हिसाब से 30 करोड़ आबादी वाला मुस्लिम समुदाय देश का सबसे बड़ा बहुसंख्यक वर्ग है। इन्हें अल्पसंख्यक मत कहो।
  8. आरएसएस दंगों पर दांव लगाता है और कमजोर हिंदुओं को आगे कर पिटवाता है। इससे हिन्दू विक्टिम दिख जाता है और लज्जित होता है।
    —- यहाँ लेखक खुद विरोधाभास में जी रहा है। आरएसएस के कहने में ही यदि मुख्य हिन्दू समाज नहीं है तो वह कैसे स्वयं को आग में झोंक देता है?
    सच्चाई यह है कि मुस्लिम दंगा भी करता है और विक्टिम बनना उसका बपौती संस्कार है जबकि सेक्युलर दल बिगड़ैल बेटे के बाप की तरह हर समय उसे छाती से चिपकाए रखता है। अब हिन्दू थोड़ा जाग रहा है जबकि मुस्लिमों को सेक्युलर दल ही उकसा रहे हैं तो ऐसी स्थिति बनी है।
    आरएसएस अपनी शांतिपूर्ण रचनात्मक भूमिका के चलते अब तक हिंदुओं को रोके रखा है। जिस दिन आरएसएस इस खेल में कूद पड़ा, उसके बाद शेष कुछ करने को रहेगा भी नहीं।
पत्थरबाजी करते पत्थरबाज

सभी सेक्युलर, लिबरल और पक्षपाती लेखक आज भी उसी तुष्टिकरण की पुरानी मानसिकता से ग्रस्त होकर, पूर्वाग्रही लेखन द्वारा न केवल मुसलमानों और हिंदुओं को गुमराह करते हैं, उन्हें उकसाते भी हैं।
वास्तविकता तो यह है कि इस साम्प्रदायिक हिंसा के पीछे इन्ही सेक्युलर लिबरल लेखकों का हाथ है। कायदे से सबसे पहले इन्हें पकड़ कर पूछताछ होनी चाहिए।

नकाबपोश पत्थरबाज

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