अफगानिस्तान में तालिबान | हमारी स्थिति क्या है ?

तालिबानी

अफगान सेना साढ़े तीन लाख, अफगानिस्तान की जनता का मौन समर्थन स्वयं की वायुसेना सहित अमेरिकी वायुसेना का सपोर्ट, भारत, रूस, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान का पूर्ण समर्थन और दूसरी ओर सिर्फ नब्बे हजार तालिबान लड़ाके।
फिर भी जानते हैं अफगानी सेना क्यों हार रही है?
क्योंकि अफगानी सैनिक बीस साल से अमेरिकियों पर निर्भर हो चुके थे और उनकी भूमिका सिर्फ ‘खबरी’ होने की रह गई।
अफगान सरकार का हिस्सा रहे ‘नॉर्दन एलायंस’ के लड़ाके भी बीस साल के परजीवी जीवन के बाद बेकार हो चुके और उनमें वह कोई दम नहीं बचा जो कभी अहमदशाह मसूद के समय हुआ करता था।
अफगान सेना के जनरलों का बस एक काम रह गया था अमेरिकी डॉलर्स पर ऐश करना और कोई भी घटना होने पर बच्चों की तरह दौड़कर अमेरिकी जनरलों से शिकायत करना।
अब अमेरिकी अपने देश चले गए तो अफगान सैनिकों की समझ ही नहीं आ रहा कि लड़ा कैसे जाता है।
अफगानों का यह व्यवहार कुछ पहचाना सा लग रहा है न?

हम अपना भी तो आंकलन करें कहीं हम भी उसी राह पर तो नहीं चल रहे है?
ऐसा इसलिए है क्योंकि मोदी-योगी और संघ की छत्रछाया में हिंदुओं का आचरण भी ऐसा ही है जैसा विगत वर्षों में अफगान सेना का रहा है।
जब आवश्यकता पड़ेगी तब केवल यही सोचना कि हमारे घर, परिवार और देश की रक्षा के प्रति हमारी तो कोई जिम्मेदारी नहीं है। उस समय पश्चाताप के सिवाय कुछ भी विकल्प नहीं होगा हमारे पास जैसा कि आज अफगान कर रहे है।
चिंता मत करो तुम्हारा हश्र भी वैसा ही होने वाला है।
बिना अभ्यास के कोई भी खिलाड़ी तथा कोई भी योद्धा अपना कौशल नहीं दिखा सकता है, वे पराजित होगा यह भी निश्चित है। इसलिए समय पर अभ्यास करते रहे कौनसी मुसीबत किस रूप में आ पड़ेगी जिसका कोई अंदाजा भी नहीं है।
तब तक आओ आरक्षण को कोसें।

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