दंगों पर सेक्युलर लेखकों का रण्डी रोना।

दंगों पर सेक्युलर लेखकों का रण्डी रोना।
वैसे ये सेक्युलर नहीं बल्कि मुस्लिमपरस्त और हिन्दू द्वेषी लोग हैं जो इधर उधर से चुग्गा मिलने पर मालिक के अनुकूल चहचहाते हैं।
देश में हो रहे साम्प्रदायिक दंगों पर इनके तर्क कुछ इस प्रकार है।

बचना आपको स्वयं को हैं, बचने के लिए मरने की सिद्धता चाहिए होती है।

बचा तो आपको पुलिस भी नहीं सकती। वह स्वयं दंगाइयों के हाथों पिट रही है।
मोदी, योगी को गरियाने वाले ध्यान दें कि आपके इन व्यंग्य वचनों से आहत होकर, कोई मोदी योगी, आपके घर आपको बचाने नहीं आने वाला।
इस देश के तीन प्रधानमंत्रियों की हत्याएं हो चुकी हैं, तो सुरक्षित तो वे भी नहीं है, आपको क्या बचा पाएंगे।
बचना आपको स्वयं को हैं। बचने के लिए मरने की सिद्धता चाहिए होती है।

भारतीय राजनीति में बदलाव

एक समय था जब भारत की राजनीति मौलानाओं और उनके फतवों के इर्द-गिर्द ही घूमती रहती थी जिसके चलते राजनेताओं का तुष्टिकरण हावी था।