भारतीय राजनीति में बदलाव

एक समय था जब भारत की राजनीति मौलानाओं और उनके फतवों के इर्द-गिर्द ही घूमती रहती थी, जिसके चलते राजनेताओं का तुष्टिकरण हावी था। यदि किसी को किसी पार्टी की टिकट मिल जाती तो उससे पहले यह आकलन किया जाता था की इसको कितने मुस्लिम वोट मिलेंगे एवं जैसे ही टिकट मिलती थी, इसके बाद सबसे पहले किसी न किसी मजार पर जाकर के मथा टेकने की परंपरा थी। इसका प्रमुख कारण यह भी था कि मुस्लिम समाज के वोट एकजुट थे एवं उनके लिए धार्मिक आह्वान प्राथमिकता में था। यदि किसी मौलाना ने फतवा जारी कर दिया कि अमुक व्यक्ति को पूरा मुस्लिम समाज वोट दें तो सब आंखे बंद करके उसी का अनुसरण करते थे। वह चाहे सही हो या गलत।

पिछले 7 वर्षों से भारत की राजनीति में बहुत बड़ा परिवर्तन आया है, आज बहुत कुछ उल्टा हो गया है। जिस मुस्लिम समुदाय के बूते टिकट पाने तथा जीतने की एक परंपरा सी बन गई थी, बाहर से उनसे दूरी रखी जा रही है। अब पूरे देश में हिंदू समाज की जागृति के कारण जो कभी अपने आप को यह तय नहीं कर पाए कि हिंदू है या मुस्लिम…

वे भी सार्वजनिक मंचों से अपने गोत्र की घोषणा करने लग गए एवं जनेऊ निकालकर दिखाने लग गए। अब स्वयं को जो मुसलमानों के सबसे बड़ा हितेषी मानते थे। वे भी चुनाव के समय सबसे पहले गूगल पर उस क्षेत्र के मंदिर को ढूंढते हैं, तथा उसकी पूजा करने का ढोंग करते हैं।

अब ठीक इसके विपरीत मुस्लिम प्रत्याशी भी आज के दौर में संतो को बहला-फुसलाकर एवं उनकी निर्मलता का फायदा उठाने की कोशिश में लगे हुए हैं।  जिस मुस्लिम धर्म में मूर्ति पूजा का स्पष्ट रूप से विरोध किया जाता है उसके ठीक विपरीत मुस्लिम राजनेता शिवजी के मंदिर में जाकर अभिषेक करते हैं, मठों में जाकर के संतों का आशीर्वाद लेने का ढोंग रचते हैं,  इसके बहाने हिंदू समाज में एक सेक्युलर वाद होने का ढोंग रचकर उनके वोट बैंक को साधने का मात्र प्रयत्न है।

संतो की कावड़ यात्रा के ऊपर फूल बरसाना, उनका स्वागत सत्कार करना एवं मेलों के आयोजन के समय अपने आप को अग्रिम पंक्ति में रखकर यह प्रदर्शित करना की हम सभी धर्मों को मानते हैं,

यह सब ढोंग है। वास्तव में खेल कुछ और है जो पर्दे के पीछे हैं अधिकतर लोगों को वह खेल दिखता नहीं है। हिंदू समाज की एकता में विघ्न डालकर अपने उद्देश्यों की पूर्ति करना तथा समय आने पर कमजोर कड़ियों पर आक्रमण करके समाज को खंडित करना ही एकमात्र उद्देश्य है। इस खेल को एक जागरूक होने के नाते हम सब को समझना अत्यंत आवश्यक है। समय रहते जाग गए तो ठीक वरना आज अफगानिस्तान में जिस प्रकार का नंगा नाच तालिबान के द्वारा किया जा रहा है वह हमारे यहां पर भी होगा ! उस समय हमारे पास आज के जैसी अनुकूल परिस्थितियां नहीं होगी।

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