साहस और संघर्ष

राष्ट्रहित सर्वोपरि

साहस और संघर्ष पर एक बात करते है अश्विनी उपाध्याय के बहाने
यह पोस्ट इसलिए नहीं लिख रहा हूँ कि मुझे सत्य बोलने या अधिक बोलने का कीड़ा काट गया है। इसलिए लिख रहा हूँ कि जब भविष्य में ऐसा कुछ करें तो और प्रभावी हो। अश्विनी जी ने जिन मुद्दों को उठाया है वे बहुत समयोचित हैं और इन पर दबाव बनाने का यह उचित समय है। इस पर किसी को विरोध नहीं, स्वयं प्रधानमंत्री भी इनमें से कई कानूनों को हटाने या लागू करने के लिए साझा सहमति की बात करते रहे हैं। अश्विनी उपाध्याय ने उसी बात को मुख्य बहस में लाने का प्रयत्न किया है जो कि ठीक है। लेकिन इस कार्यक्रम के आरम्भ में ही उन्होंने झूठ बोला। मेजर जनरल बक्शी जी इत्यादि के नाम का इस्तेमाल किया लेकिन न उन्हें सूचना दी न ही उनसे अनुमति ली, यही अन्य आमंत्रित सदस्यों का भी कहना है। मान लेते हैं कि यह भी कोई छिपी रणनीति है तो भी ऐसे बड़े इवेंट असत्य की नींव पर नहीं होने चाहिए क्योंकि बाद में फ़ॉलोअर्स स्वयं को ठगा हुआ महसूस करते हैं और आयोजको की विश्वसनीयता घटती है।

अश्विनी उपाध्याय

जिन विषयों को उन्होंने उठाया है वे कोई आज की समस्याएं तो है नहीं, दशकों, शताब्दियों में तैयार हुई समस्याएं हैं, यह वे भी जानते हैं और हम भी इनका हल भी कोई दो मिनट में नहीं निकलेगा। लम्बा और सतत संघर्ष चाहिए और इसमें बहुत ज्यादा समय श्रम, धन, मानव शक्ति लगेगी। यह सबको पता है। बड़ी भारी चट्टान है, टूटते टूटेगी। यद्यपि नारेबाजी या वह पहले हुई, बाद में हुई इससे कोई मतलब नहीं। आश्चर्य इस बात का हुआ कि गिरफ्तारी होते ही चीख पुकार शुरू हो गई। हाय हाय का विक्टिम रोना करने लगे। अरे भई, आप आजादी के आंदोलन जितनी बड़ी लड़ाई छेड़ रहे हैं और पहले ही पॉइंट पर रोने धोने लगे!!
लड़ाई लड़ रहा है योगेंद्र यादव। विगत 6 महीने हो गए, पूरी कोशिश में है कि लाठी गोली चले, लोग मरें, मुकदमे चलें। यानी देशद्रोही गैंग मरने के लिए भी तैयार है, संसद में कांग्रेसी जान बूझकर ऐसी हरकतें कर रहे हैं कि उनकी सदस्यता चली जाए, वे अपना सबकुछ न्यौछावर करने को तैयार है और एक इधर वाले हैं, चिंगारी लगाकर भागना चाहते हैं। थोड़ी सी आंच आते ही मुकर रहे हैं, तुलना कर रहे हैं, खुलेआम किये कांड से बचकर भागना चाहते हैं। बड़ा काम करना भी चाहते है लेकिन उसमें संघर्ष भी नहीं करना चाहते है, भगत सिंह पडोसीके घर में पैदा हो।
ऐसे नहीं होती लड़ाइयां।
धीरज चाहिए, जिजीविषा चाहिए, बलिदान होने की तैयारी चाहिए। स्वीकार करने की हिम्मत चाहिए। यूँ नहीं कि आग लगाकर भाग जाएं और बुझाओ बुझाओ चिल्लाते रहें। यदि संघर्ष ही करना है तो तरीके से करो न। सबकुछ होगा।

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