पद्मश्री नहीं मिलने से वामपंथी परेशान

एक समय था जब भारत का सत्ताधारी दल बड़े-बड़े रासुलदारों के तलवे चाटने तथा उनको खुश करने में दिन रात लगा हुआ था। उनको खुश करने के लिए भारत के गौरवशाली सम्मान भी उन चमन चू@यों को दे दिया करते थे। ताकि समय आने पर वह उनका अपने लिए उपयोग ले सके।
पहले यह परंपरा बनी हुई थी कि किसी फिल्मी भांड, वामपंथी पत्रकार, कम्युनिष्ट लेखक, खान गैंग, टुकड़े-टुकड़े गैंग तथा जिहादी गैंग आदि पर समाजसेवा का टैग लगाकर उनको पद्मश्री का पुरस्कार दिया जाता था।
लेकिन अब ठीक इसके विरुद्ध उनको पद्मश्री का पुरस्कार दिया जा रहा है जिनके पैरों में चपल तक नहीं है और न ही उनके तन पर अच्छा कपड़ा पहना हुआ है। लेकिन जो उन्होंने कार्य किया है वह राष्ट्र के लिए वास्तव में गौरवशाली रहा है। अब इस देश में संस्कृति संरक्षण, पर्यावरण सरंक्षण, फल विक्रेताओं एवं समाज सेवा के श्रेष्ठ कार्यों का सम्मान होने लगा है। सामान्य लोगों को भी पद्मश्री जैसे गौरवशाली सम्मान मिल रहा है।
जिनको आज श्रेष्ठ सम्मान मिल रहा है उन लोगों ने कभी इस सम्मान की कल्पना सपने में भी नहीं कि होगी।

जिहादी भांड

इस परिवर्तन से भारत में एक वामपंथी गैंग है जिनके पेट में मरोड़े उठ रहे है। उठने भी स्वाभाविक है क्योंकि लगातार 70 वर्षों तक जो मलाई खाई है आज इनको कोई पूछता तक नहीं है।
आज जो लोग पद्मश्री देने वालो की योग्यता पर प्रश्न उठा रहे है उनको बता देना चाहता हूं कि आज वास्तव में जो असली हकदार है उनको अब अपना सम्मान मिलना आरंभ हुआ है। यह लोग उस समय कहाँ थे जब जिहादी भांड को सम्मान दिया जा रहा था, घुंघराले बालों वाली वामपंथी पत्रकारों और लेखिकाओं को झूठी तारीफ का सम्मान दिया दिया जा रहा था।

पद्मश्री के वास्तविक हकदार

आज जब सम्मान लेने के लिए आने वालों के कपड़ों में इस्त्री नहीं कि हुई है, पैरों में ब्रांडेड जूते तो दूर नंगे पैर सम्मान लेने के लिए आ रहे है।
भारत आध्यात्मिक की राह कर्म प्रधानता की ओर अग्रसर है, यह सब देखकर वामपंथी पचा नहीं पा रहे है।

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