नाम का महत्त्व कम मत आंकिए!

1965 और 1971 के भारत पाक युद्धों में, जबकि संचार का सबसे सुलभ माध्यम रेडियो था, देश के जवानों में उत्साह और वीरता का संचार करने के लिए दिन रात जो गीत बजाए जाते थे उनमें बार-बार महाराणा प्रताप और शिवाजी महाराज के नाम गूँजते थे।
ओ पवन वेग से उड़ने वाले घोड़े…..
देखो मुल्क मराठों का ये, जहाँ शिवाजी डोला था…..
लेखक स्वयं 1999 के कारगिल और 2003 के संसद पर हमले के समय बॉर्डर पर एकदम वीरान कोने पर रहता था। उस समय मेरी कोठरी में मैं और मेरा रेडियो ही था।
विविध भारती और ऑल इंडिया रेडियो पर फौजी जवानों के लिए रात दिन प्रसारण होते थे।
देशभक्ति गीतों की धूम थी।
एक भी गीत ऐसा नहीं था जिसमें “साबरमती के संत”  या रंग अमन का वीर जवाहर से जैसी पंक्ति बजी हो?
जब युद्ध का माहौल हो तो देश में गाँधी, नेहरू छुट्टी पर चले जाते हैं। जब बात न्याय, सत्य, त्याग, पवित्रता और औदार्य की हो तो हुंमायूँ, बाबर, खिलजी, रजिया वगैरह कूड़े में डाल दिये जाते हैं। तब उसे झकमारकर शिवि, हरिश्चंद्र, भामाशाह, महारानी पद्मिनी और पृथ्वीराज चौहान का ही उदाहरण देना पड़ता है।
जब आपको अपनी सन्तान में संस्कार डालने हैं तो आप औरंगजेब का किस्सा नहीं सुनाते, श्रवण कुमार की कथा बताते हैं।
जब लगता है कि अभी नहीं तो कभी नहीं, आर या पार, अन्यथा बंटाधार……
तब कोई नहीं कहता कि अकबर महान था या हैदर अली और टीपू सुल्तान को याद कर, जवानों!! आगे बढ़ो!!
उस समय कोई जवान इन बासी, बोगस, कृत्रिम, गढ़े गए जबरदस्ती के नामों से प्रेरित नहीं होता। भले ही दसवीं पास फौजी पाठ्यक्रम में कितना भी रट्टा मार कर आया हो कि शाहजहां ने प्यार की निशानी ताजमहल बनवाया किन्तु उसकी भुजाएं तो गुरु गोविंदसिंह और बन्दा वैरागी के नाम से ही फड़कती हैं।
यह कितना हास्यास्पद है कि संकट के समय कोई भी अकबर बीरबल के जोक्स की शपथ नहीं लेता फिर भी आधा सिलेबस इस बकवास से भरा है और बच्चों का अत्यंत कीमती समय इन जोकरों पर खर्च किया जाता है!!
आज भी, नित्य व्यवहार में एक दूसरे को विश्वास दिलाने के लिए ग्राम देवता या कुलदेवी के नाम का हवाला दिया जाता है!!

क्यों एक गुमनाम से चार फुट चबूतरे वाले भोमिया जी के आस पास सैकड़ों एकड़ गोचर में कोई दातुन भी नहीं तोड़ता और राजीव-इंदिरा-नेहरू के नाम पर बने पार्क के फाटक भी रातोंरात चोरी हो जाते हैं?
क्यों किसी सती के जीर्ण शीर्ण देवरे पर सिंदूर में पुती प्रतिमा के सामने किसी स्त्री के प्रति अपमानजनक शब्द कहने की हिम्मत नहीं होती? अगर गलती से भी उधर मुँह करके पेशाब कर दिया तो रात को ही हवा टाइट हो जाती है जबकि जामिया मिल्लिया या अलीगढ़ नाम से बनी बिल्डिंग में किसी कन्या के प्रवेश की भी हिम्मत नहीं पड़ती? तथाकथित समाजवादी और स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर बने लोकहित के संस्थान में वे सभी कुकर्म होते हैं जिनकी चर्चा से ही रूह कांपती है।
स्पष्ट है कि नाम का महत्त्व है।
बहुत बड़ा महत्त्व है।
वह ऐसे कि आप किसके नाम का उपयोग कर रहे हैं?
नकली इतिहास, नकली किताबें, नकली महापुरुष चाहे जितने खड़े करो, जब अत्यंत आवश्यक हो, जब बहुत बड़ी चूक में हो, जब संकट आपके प्राणों पर हो, जब शत प्रतिशत परिणाम और उपलब्धि की अपेक्षा हो, आप भी असली की शरण में ही जाते हैं।
बहुत बड़ी गलती हो गई भारत से। हरेक जगह सत्य को दबाकर असत्य की प्रतिष्ठा करनी चाही।
यह बहुत बड़ा अपराध था।
क्रीड़ा जगत का सर्वोच्च पुरस्कार यदि मेजर ध्यानचंद के नाम पर रखा गया है तो वह उस महापराध का हल्का सा प्रायश्चित है।
तिलमिलाने की बजाय स्वीकार करो।

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