मोदी जी की नीयत साफ है…

हालांकि पेट्रोल डीजल और विलासिता से हटकर सोचें तो कपड़ा, बर्तन और रहन सहन की कच्ची सामग्री बहुत सस्ती और बहुतायत से मिल रही है।
लेकिन आज केवल खाद्य, अर्थात भोजन की बात करते हैं। मोदीजी ने तकनीक के उपयोग से इतना कर दिया है कि सारा लाभ सीधे सम्बंधित को ही मिलता है। पारदर्शिता का आलम यह है कि मिड डे मील के पैकेट में आप 100 ग्राम भी हेर फेर नहीं कर सकते। यही हाल सरकारी योजनाओं का जन धन बैंक खाते में जमा होने को लेकर है।
मोदीजी अपनी लड़ाई तकनीक द्वारा जीत रहे हैं।
भोजन मनुष्य की आदिम समस्या रही है।
हमने आजादी के बाद से भोजन के लिए ही इतना संघर्ष किया है कि भूख हमारे अवचेतन में जम गई है। हमें हर समय लगता है कि भूख से मर जायेंगे। मीडिया और राजनीति के लिए भूख एक सदाबहार, लोकप्रिय इवेंट था। गरीबों की भूख एक बहुत बड़ा बिजनेस था। नेताओं का हथियार था। आजकल मीडिया में भूख से मौत की खबरें गायब हैं।
इसी देश ने मात्र 30 बरस पहले कांग्रेस के राज में दस किलो अनाज, 2 मीटर कपड़ा, 3किलो शक्कर और 5 किलो चावल सहित केरोसिन केलिए महीने में 10-10 दिन लाइन में बिताए हैं।
आज पेट की भूख कोई बड़ा इश्यू नहीं रहा, भारतीय तो क्या, भिखारी, रोहिंग्या और बंगलादेशी तक को यह देश पाल रहा है।
सही कहा है राजा कालस्य करणम्।।
जब राज की नीयत शुद्ध हो तो प्रकृति भी सहयोग करती है। वरना बंगाल में आज भी मानव बल से साइकिल रिक्शा चल रहा है और सड़कों पर दम तोड़ने की घटनाएं भी केवल वहीँ बची है।
शेष भारत में कैलोरी के जुगाड़ की समस्या नहीं है, कैलोरी बर्न की समस्या है।

Narendra Modi

मेरे एक मित्र के ट्यूबवेल है, यहां से 50km दूर, वहाँ पर बंटाई से एक कृषक परिवार रहता है। बहुत गरीब और वंचित समझे जाने वर्ग से, मतलब वह वर्ग जो कुछ वर्ष पहले हमारे घरों में मांगकर खाते थे उनसे।
दो दिन पहले उन्होंने मित्र की गाड़ी में दस किलो चना दाल रखते हुए कहा “बाबूजी घर ले जाइए, ठकुरानी जी ने बेसन मंगवाया था न, इसे पीस देना।”
उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। जो हमेशा मांगकर ही खाते रहे हैं वे दस किलो दाल भेज रहे हैं, वह भी बिल्कुल मुफ्त!!
जब उन्होंने कारण जानना चाहा तो वे बोले “क्या बताएं, बाऊजी! चार बच्चों के नाम स्कूल में है, आंगनवाड़ी है, कम मूल्य के अनाज की दुकान है, चारों तरफ से इतना अन्न, दाल, तेल, मसाला मिल जाता है कि कभी खरीदने की जरूरत ही नहीं पड़ती। ऊपर से शब्जी खेत में ही हो जाती है तो यह दाल बच गई। हमारे कल 8 पैकेट और आने वाली है। इतना कौन खाएगा? आप ले जाइए।”
देश में मंहगाई, खासकर खाद्यान्न के बारे में तो अब रोना बन्द कर देना चाहिए।

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