सप्तमातृका और माँ आवड़

सप्तमातृका और माँ आवड़ भवानी
शाक्त परम्परा में भारत को बावन प्रान्तों में बांटा गया था। सती-दहन-कथा के अनुसार देवी का जो अंग जिस प्रान्त में गिरा वहाँ की अधिष्ठात्री देवी उस नाम से कहलाई।
इस प्रकार प्राचीन अखण्ड भारत के हिंगलाज प्रान्त में, जहाँ देवी का ललाट प्रतिष्ठित है, आज का मारवाड़, कच्छ, सिंध, पंजाब, बलोचिस्तान और ईरान क्षेत्र सम्मिलित था।
यह सबसे समृद्ध, सभ्य और सम्पन्न प्रान्त था क्योंकि यहाँ 7 नदियां बहती थीं, जिनमें सरस्वती और दृषद्वती दो प्रमुख थी। इन्हीं के तट पर हमारे पूर्वजों ने वेदों का गायन किया। ऋग्वेद में इनका विशद वर्णन है। इन नदियों के मध्य भाग को ब्रह्मावर्त कहा गया है।
आज से 5000 वर्ष पूर्व पर्यावरणीय कारणों से सरस्वती नदी विलुप्त होने लगी। दृषद्वती का अधिकांश जल यमुना की तरफ प्रवाहित हो गया और वह भी सिकुड़ कर पश्चिम की तरफ खिसक गई। वर्तमान सिरसा, कालीबंगा, पीलीबंगा, अनूपगढ़ से बहने वाली घग्घर में हम सरस्वती दृषद्वती के अवशेष देख सकते हैं।
जिसे हम हड़प्पा सभ्यता कहते हैं वह वास्तव में सरस्वती सभ्यता थी।
लगभग सम्पूर्ण भारत में अनादिकाल से सप्त देवियों की पूजा होती है, यही वह प्रमाण है जो सिद्ध करता है कि कथित सिंधु घाटी सभ्यता भी हम भारतीयों की ही बनाई हुई है। क्योंकि वहाँ सप्तमातृका की प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं। सात देवियों के प्रमाण तो दक्षिण भारत में भी मिलते हैं लेकिन इस प्रान्त हिंगलाज में तो देवी का अर्थ ही 7 बहिनें हैं जिनकी प्रतिमाएं सिंधु सभ्यता से लेकर वर्तमान तक उसी स्वरूप में आज भी प्राप्त होती हैं।
सप्तमातृका का सम्बंध इन सात नदियों से भी है और ब्राह्मणी, वैष्णवी, माहेश्वरी, वाराही, चामुंडा, इंद्राणी, कौमारी इन सात देवियों से भी हैं।
पश्चिमोत्तर भारत की सभी जातियों में सप्तदेवीयों की बड़ी भारी मान्यता है। राजपूत, ब्राह्मण, भील, मेघवाल यहाँ तक कि मुसलमानों में भी इनकी पूजा की जाती है। परम्परागत रूप से एक चांदी का गहना जिसे थाला कहते हैं बच्चों के गले में पहनाया जाता है जिस पर सात बहिनों और बीच में एक भाई क्षेत्रपाल की आकृति बनी हुई होती है।
भारत के चारण समाज में इन सात देवियों को अत्यंत पवित्रता से इष्टभाव से पूजा जाता है। यही कारण है कि इतिहास में बहुत बार माँ भवानी ने कभी एक रूप तो कभी सप्तरूप में इनके परिवारों में जन्म लिया।
चारण स्वयं यौद्धा और कवि रहे हैं, राजपूतों को सदैव सजग करते रहने में इनके अद्भुत योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता।
चालकनू या चेलक गांव के ऐसे ही एक चारण मम्मटदेव (मामड़जी) के घर मां आवड़ जी अपनी सात बहिनों के साथ प्रकट हुईं।
राजा चच ने ही सिंध का वर्तमान शहर छाछरो बसाया था। उसका पुत्र दाहिर और पौत्र जयसिंह हुआ। 712 में सिंध पर अरबों का अधिकार हो गया।
उस समय के इतिहास का प्रामाणिक वर्णन अरबी पुस्तक “चचनामा” में मिलता है जब राजा दाहिरसेन को मुहम्मद कासिम ने जीत लिया था और सिंध में धर्मांतरण चल रहा था। यह सन 700-800 के बीच का कालखंड था।
सिंध से उत्तर में पंजाब भाटियों के पास था जिसकी राजधानी गढ़ देरावर और भटनेर आदि थी और वर्तमान जैसलमेर परमारों के पास था जिसकी राजधानी लौद्रवा थी। इन दिनों गुजरात में राष्ट्रकूट शासन कर रहे थे और चालुक्य वंश स्थापित होने के प्रयास कर रहा था। उस समय जैसलमेर प्रदेश को माड़धरा कहा जाता था।

अधिकांश प्रदेश मरुभूमि बन चुका था और एकमात्र हाकड़ा नदी बहती थी। गढ़ देरावर (वर्तमान बहावलपुर) के आस पास सिंध और हाकड़ा के बीच का मैदान बहुत उपजाऊ और हरा भरा था।
दाहिरसेन की हत्या और अरबों की सिंध पर विजय एक क्रूर घटनाक्रम था। भारत इस्लाम नामक इस नवीन मजहब से अपरिचित था और अरबों के अत्याचार, खासकर स्त्री जाति के प्रति उनकी क्रूरता से पूरा हिंदुस्तान दुःखी हो गया था।
मुहम्मद बिन कासिम के बाद धर्मांतरित मुस्लिम सिंध की जनता पर अत्याचार करने लगे जिनमें समा और सुमरा प्रमुख थे।
अपनी मातृभूमि में पड़े अकाल के कारण ईस्वी सन 775 के आस पास, मामड़जी पशुधन सहित हाकड़ा के पश्चिम में चले गए। उनके साथ उनकी 7 पुत्रियां भी थीं जिनमें सबसे बड़ी आवड़ जी थी। शेष बहिनों के नाम क्रमशः हुली, गुली, रेप्यली, आछो, चन्चिक और लघ्वी थे। ये सभी अत्यंत रूपवती और दैवीय स्वरूपा थीं।
चूंकि सिंध में मुस्लिम अत्याचारों का भयंकर त्रास था और जहां भी कोई सुंदर कन्या दिखती उसे मुसलमान उठाकर ले जाते तो ऐसे ही नानंणगढ़ के एक वणिक कुशलशाह की दो कन्याओ पर वहाँ के शासक उमर सूमरो की कुदृष्टि पड़ी।
डरा सहमा परिवार अब माँ हिंगलाज को स्मरण करने लगा। तब मां आवड़ जी ने उस परिवार को और वहाँ के जैन समाज और साधुओं को वहाँ से सकुशल निकालकर माड़धरा पहुंचा दिया। इससे उमर इतना क्रोधित हुआ कि उसने मामड़जी पर दबाव डाला कि वह उनकी सातों पुत्रियों का विवाह अपने पुत्र नूरन से करेगा।
अब स्थिति यह थी कि दो नदियों के बीच का प्रदेश है, दोनों तरफ मार्ग बंद है, एक पिता है, जो अपनी मातृभूमि और भाई बंधुओं से बहुत दूर है, साथ में उसके गायें हैं और 7 सुंदर युवा पुत्रियां हैं और सामने एक मुस्लिम शासक है जो उनसे छीनना चाहता है। ये लोग निर्णय लेते हैं कि पूर्व की तरफ, जिधर लौद्रवा है उधर रात में पलायन करेंगे। लेकिन समस्या हाकड़ा नदी को पार करने की है क्योंकि उन दिनों नदी पूरे वेग से बह रही थी और नाविक आदि सभी मुस्लिम शासन के चुगलखोर थे।
ऋग्वेद में एक ऐसी घटना है, कि जब भयंकर बाढ़ आती है, विश्वामित्र का मार्ग रुक जाता है तो वे सरस्वती और दृषद्वती को मार्ग देने के लिए अत्यंत श्रद्धा से ऋचाएं पढ़ते हैं।
पीछे सूमरो की सेनाएं हैं, आगे विशाल घग्घर है और सात बहिनें, एक भाई, पिता मामड़जी और बहुत सारी गायें, अंधेरी रात, ऐसे में आवड़ जी नदी को रास्ता देने की प्रार्थना करती हैं।
अचानक भयंकर बिजलियाँ चमकने लगती है, बादलों की गर्जन के साथ उत्तर में एक भयंकर तूफान आ जाता है। इस तूफान का वर्णन चचनामा पुस्तक में भी है। यह सम्पूर्ण सिंध को तबाह कर देता है जिससे सतलुज नदी में इतनी जबरदस्त बाढ़ आ जाती है कि उसकी एक शाखा छिटककर घग्घर में मिल जाती है। घग्घर यानि हाकड़ा उफनने लगता है और अनूपगढ़ के आस पास वह छलककर एक नए मार्ग पर और पश्चिम की तरफ स्थानांतरित हो जाता है पुराना हाकड़ा सूख जाता है, जिसके कारण जहाँ आवड़ जी खड़े हैं वहाँ उसका मार्ग बदल जाता है।
अब पासा पलट चुका था। नई धारा आवड़ जी के दल और मुस्लिम सेना के बीच में से निकलती है। इसके अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं। पूरा नानंणगढ़ तबाह हो जाता है, सूमरो और उसकी सेनाएं इस विनाशलीला में बह जाते हैं।
आवड़ जी चलकर वर्तमान में जहां तनोट माता मंदिर है इस स्थान पर अपना डेरा देती हैं। इस प्रकार तनोट वह प्रथम स्थान है जहाँ माता अपने स्वरूप दर्शन के बाद पहला पड़ाव डालती हैं। यहाँ उस समय सोलंकी राजपूतों की एक शाखा रहती थी, वे उन्हें मां हिंगलाज का अवतार मान कर पूजा करते हैं, बाद में इसी स्थान पर भाटियों की सातवीं राजधानी स्थापित होती है।
यहाँ से माँ आवड़ जी की अनेक चमत्कार घटनाएं आरम्भ होती है। उस समय इस क्षेत्र में हूण आक्रांताओं के टोले कहीं कहीं बचे हुए होते हैं, ऐसे ही एक तेमड़े नामक हूण को मारकर वे इस पर्वत पर निवास करती हैं। यहाँ रहकर वे भारत के राजनीतिक घटनाक्रम को प्रभावित करती हैं। वे घण्टियाल स्थान पर चालुक्यों को बसाती है। राजपूत राजाओं को परस्पर जोड़ती हैं। सातों बहिनें पूरे हिंगलाज प्रान्त(मारवाड़, पंजाब, गंधार, बलूचिस्तान, सिंध और गुजरात) में प्रवास करती हैं। पंजाब के शासक लखियार जाम और भाटी राव तणू में समझौता करवाती हैं।
सिंध के इस पार बिखरी राजपूत शक्ति का मार्गदर्शन करती हैं। तत्कालीन पूगल, अमरकोट, लौद्रवा, काठियावाड़, गुर्जरात्रा, मुल्तान आदि शक्तियों में समन्वय स्थापित करती हैं। ईसवी सन 800 के आस पास राजपूतों की संयुक्त शक्तियां, जिनमें बाप्पा रावल और मिहिरभोज विशेष पराक्रमी हुए, अरबों से सिंध छुड़ा देते हैं। एक बार फिर सम्पूर्ण हिंगलाज प्रान्त मुक्त हो जाता है वे और उन्हें खदेड़ कर दमिश्क में छोड़ आते हैं। इसके बाद लगभग 300 वर्ष तक भारत इन दुष्ट शक्तियों से बचा रहता है।
एक बार पुनः सप्तमातृका की स्थापना होती है। आज भारत का एक बहुत बड़ा हिस्सा सिंध में धंसा हुआ दिखता है, भारत की सीमा इस स्थान तक टिकी हुई है क्योंकि माँ आवड़ का मंदिर तनोट यहाँ विराजमान है।

अमरकोट में ये मानसरियाँ हैं, गुजरात में खोडियार मां हैं, मारवाड़ में योगिनियां हैं, हरेक गांव कस्बे, पर्वत पर किसी न किसी रूप में पूजित हैं।
लगभग 100 वर्ष तक तेमड़े पर्वत को केंद्र बनाकर भारत की पश्चिमी सीमा पर सुरक्षा चक्र का संचालन कर धर्म की स्थापना करती रही और बाद में एक दिन सातों बहिनें शिला पर बैठकर हिंगलाज की तरफ उड़ चली और देखते ही देखते अदृश्य हो गई।
मां आवड़ जी भले ही अदृश्य हो गई लेकिन अपने भक्तों के बीच वे आज भी एक पुकार पर उपस्थित हो जाती हैं। 1965 का भारत पाकिस्तान युद्ध इसका साक्षी है। उन्हीं की परंपरा में करणी माता का जन्म हुआ।
बिना सप्तसैंधव आर्यावर्त अधूरा है,
बिना सप्तमातृका धर्म अधूरा है,
बिना मां हिंगलाज भारत अधूरा है,
बिना मां आवड़ हिन्दू धर्म अधूरा है।

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