इंटरव्यू के नाम पर वामपंथ का खेल

“एक फैक्ट्री है, उसका मालिक हैं और बहुत सारे नौकर हैं।
मालिक मुनाफा कमाता है, और अपने नौकरों को नाममात्र की तनख्वाह दे, शेष लाभ हजम कर जाता है।
नौकर धूप, पसीने में काम करते हैं और मालिक एसी रूम में बैठ कम्प्यूटर चलाता है।
नौकर की घरवाली बीमार है, उसे दवाई के पैसे नहीं मिलते। उसे छुट्टी चाहिए, पर मिलती नहीं। बिटिया पढ़ाने की पूरी फीस नहीं है, जबकि मालिक के मौज ही मौज है। नौकर जानते हैं कि मालिक उनकी ही मेहनत पर ऐश कर रहा है। सोचकर ही देखिये, उनके मन में मालिक के प्रति कितना गुस्सा होगा। एक दिन मालिक पार्टी में दारू पीकर बेखबर अपने कमरे में सो जाता है। गलती से दरवाजा खुला रहता है। नौकर उठे, कमरे में घुसे। उनके हाथ में हथौड़ा है। ये छोटे वाला नहीं, वो बड़ा सा जो kgf फ़िल्म में होता है …….”
यहाँ विकास दिव्यकीर्ति अपने हाथों से हथौड़े की साइज बताता है।

आप मानो या न मानो, लेकिन दृष्टि आईएएस कोचिंग वाला विकास दिव्यकीर्ति एक वामपंथी है।
बल्कि आईएएस परीक्षा, कोचिंग, पाठ्यक्रम और प्रिशिक्षण से जुड़ा सारा नेक्सस ही वामपंथी है।
मुस्कान के साथ, लम्बे लंबे विद्वत्ता के भारी व्याख्यान देने वाला दिव्यकीर्ति अपने एजेंडे को सर्वाधिक इंजेक्ट करता है मॉक इंटरव्यू में।

विकास दिव्यकीर्ति

चूंकि इंटरव्यू सबसे अधिक संवेदनशील होता है, उसके नाम से ही अच्छे अच्छे कांप जाते हैं, वहाँ पहुंचने वाले इस मानसिकता के होते हैं कि वे किनारे पर बिल्कुल नहीं डूबना चाहते। पीछे खर्चा, मेहनत, नौकरी का ग्लैमर, सब दांव पर है। दो चरणों के रिजल्ट तक तमाशबीन-भीड़ और परिजन जबरदस्त प्रचार प्रसार कर शुभकामनाएं दे चुके होते हैं, तो हरहाल में उत्तीर्ण होने का बहुत दबाव रहता है।
ऐसे समय में वे इंटरव्यू को बहुत ध्यान से देखते हैं, वे इसकी हरेक सूक्ष्मता को बहुत गहराई से पचाने की कोशिश करते हैं।
और तब धीरे से उनमें प्रगतिशीलता के नाम पर मार्क्सवाद, वामपंथ, सेक्युलरिज्म, हिंदुओं के प्रति स्थाई पूर्वाग्रह इंजेक्ट कर दिया जाता है।
अब यहाँ दो स्थितियां बनती हैं:-

1. वे जो इस खेल को पहचानते हैं और झूठ मूठ के अस्थाई वामपंथी बनकर इंटरव्यू में जाते हैं, जाहिर है कि ये सबसे स्मार्ट और बुद्धिमान होते हैं क्योंकि दोनों ही स्थितियों से परिचित हैं।
2. वे जो सचमुच के वामपंथी बनते हैं, उन्हें लगता है जैसा बनाया जा रहा है वैसा बनना भी चाहिए, और ये पहले वालों से कम बुद्धिमान होते हैं।
आपको जानकर आश्चर्य होगा कि पहले वालों का सलेक्शन नहीं होता और दूसरे वालों का हो जाता है। वहां बहुत सारे फिल्टर लगे होते हैं जो उस दुरभि द्वार को क्रॉस ही नहीं होने देते।
जैसे डॉक्टर बनने वाला अपनी शारीरिक हया और नंगेपन की लज्जा बाहर छोड़कर ही भीतर घुसता है वैसे ही इस फील्ड में जाने वाले के लिए देशभक्ति, भक्ति, धर्म, संस्कृति बहुत गौण और तुच्छ हो जाती है। (अपवाद छोड़कर)
जरा इंटरव्यू से उत्तीण और अनुत्तीर्ण लोगों की तुलना कीजिए, आपको स्वयं समझ में आ जायेगा। वहाँ ज्यादा अक्ल वालों का कोई स्थान नहीं है।

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