आजादी के क्रांतिवीर

जब हम स्वतंत्रता पर चर्चा करते हैं
तब देशभक्त हो जाते हैं। स्वयं को देशभक्त मानकर कहीं भाषण देते हैं, कहीं भाषण सुनते हैं। उसमें कई नाम और प्रसंग भी आते हैं। मुझे सबसे ज्यादा कोफ़्त होती है जब कोई गाँधी या नेहरू का नाम लेकर आजादी के बारे में बात करते हैं।
आपको हो या न हो, पर मुझे इन नामों को सुनते ही कोई स्पंदन नहीं होता। बिल्कुल भी देशभक्ति जैसा फील नहीं होता।
बस यही कि जैसे कोई रटी रटाई बात बोले जा रहे हैं।
एक नकलीपन लगता है। लगता है जैसे मैं खुद को ही धोखा दे रहा हूँ। वहीं जब किसी देशभक्ति गीत में सुभाष, चंद्रशेखर आजाद या भगतसिंह का नाम आता है तो बिल्कुल अलग अनुभव होता है।
15 अगस्त को देशभक्ति गीत या फिल्मों में जब तक क्रांतिकारियों की बात नहीं आती, लगता ही नहीं कि कोई देशभक्ति का उत्सव आया है।
करोड़ों किताबों में लाख बार समझाया गया है कि आजादी का आंदोलन ऐसे ऐसे था, लेकिन बिल्कुल भी रस नहीं आता। लगता है कोई उबाऊ नकली साहित्य पढ़ रहे हैं या यूं लगता हैं जैसे देशभक्ति नहीं, कोई पर्यावरण संरक्षण की चर्चा चल रही है।
अतः आप देखना हरेक वक्ता अपनी वाणी को प्रभावशाली बनाने के लिए क्रांतिकारियों के नाम लेगा।
चंद्रशेखर आजाद, भगतसिंह, रानी लक्ष्मीबाई, राजगुरु, सुखदेव, सुभाष चंद्र बोस, खुदीराम बोस, बाघा जतिन वगैरह की बात करके आजादी का पर्व मनाया जाता है।
अच्छा, जिन लोगों का नाम लेकर स्वतंत्रता दिवस को रोचक बनाया जाता है और जिन लोगों को विगत 75 साल तक आजादी का क्रेडिट दिया गया, उनके प्रति इनका क्या व्यवहार रहा था?
जानोगे तो शर्म से डूब मरना होगा।
मगर हम इंडियन हैं तो सब चल जाता है। ले देकर अपने मन के किसी न किसी कोने में ऐसी जानकारी भी ठूंस ही देते हैं जो सामान्यतः किसी के भी गले नहीं उतरती।

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