रामभक्त कल्याण सिंह का समर्पण

राम काज कीन्हें बिनु, मोहि कहां विश्राम…
जबकि कोई बस में भी अपनी सीट छोड़ने को तैयार नहीं, उन्होंने रामकाज के लिए अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी भी छोड़ दी।
श्री कल्याण सिंह जी वास्तव में भारतीय राजनीति में रामजी की इच्छा से प्रतिस्थापित सितारे थे।
राजनीति का एक वह भी दौर था जिस समय बाप को मार कर या जेल की सलाखों में डाल कर बेटा गद्दी पर बैठता था।
निर्मम राजनीति के वातावरण में वे देश के सबसे बड़े प्रदेश की सर्वोच्च गद्दी त्यागकर आकाश से भी ऊँचे हो गये, जबकि हम हिंदुओं ने अपने स्वभाव के अनुसार उन्हें और दूर….. और दूर धकेल दिया।
प्रचण्ड जातिवादी मायावती को लाये या नीच गुंडागर्दी वाले मुलायम को बिठाया।
उस महामानव ने बिना कोई शिकायत किये, बिना किसी को दोष दिए, मौनभाव से सबकुछ सहन किया।
अपने बाद के जीवन को भी पूरी तन्मयता से जिया और प्रतिपल यह संदेश देते हुए बिताया कि धर्म के पथ से एक पग भी विचलित नहीं होना चाहिए।

कल्याण सिंह

एक समय राजनीति सेवा का सबसे उत्तम माध्यम हुआ करता था, आज के दौर में राजनीति एक व्यवसाय बन गई है, इस समय त्याग और समर्पण केवल आदर्श वाक्य ही रह गया है, जिसे चरितार्थ करने का साहस केवल कल्याण सिंह जी जैसे व्यक्ति में ही था।
जब बाबरी ढांचा ध्वस्त किया गया था, तब उन्होंने कहा था कि राम के नाम पर ऐसी कई कुर्सियां न्योछावर कर दूंगा, यह भी कहा था कि राम के काम आ सकूं यह मेरा सौभाग्य है।
2014 में श्री नरेन्द्र मोदी के केंद्र में अभ्युदय के बाद उनका जीवन शांति और सम्मान से बीता, लेकिन दीन दुखियों के प्रति समर्पण और धर्म के प्रति निष्ठा में उनके कहीं कोई कमी नहीं आयी।
कल्याणसिंह क्या थे? यह आज सोशल मीडिया पर उठे उनके श्रद्धांजलि देने के ज्वार से समझा जा सकता है।

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