आपसी झगड़ा जिहाद की साजिश है

कुछ दिन पहले की बात है जब बस अड्डे पर मैं एक बस में बैठा था।
मुझसे दो पंक्ति छोड़कर एक सिख बुज़ुर्ग बैठे हुए थे। तभी दो भाईजान आए, आगे और पीछे के दरवाज़े से फल बेचने आरम्भ किए। फिर वे दोनों बुज़ुर्ग सरदार जी के पास पहुंचकर आपस में झगड़ना आरम्भ कर दिया था। बात हाथापाई तक पहुँच गई थी। लोगों ने बीच बचाव किया तो वे दोनों एक-दूसरे को कोसते हुए दूर चले गए। दो मिनट बाद ही सरदार चिल्लाते है-  अबे अरे मेरी जेब ! मेरी जेब कट गयी!
तब हम सबकी समझ में आ गया कि इस झगड़े का उद्देश्य जेब काटना ही था।
इनके देशों में गृह युद्ध-हिंसा जब थमता है, तो काफ़िर देशों में इनकी संख्या ओर बढ़ चुकी होती है।
यहाँ तक कि भारत में किसी भी दंगे के एक-दो साल बाद सर्वे कीजिए। इनके क़ब्ज़े की भूमि सदैव दंगे से पहले के समय से अधिक मिलेगी, जैसे:-  मकान-दुकान। ये हिंसा,उपद्रव और आक्रामकता से आपको अपने इलाके से भगाकर उस पर कब्जा कर लेंगे फिर उसे आतंक का अड्डा बनाएंगे।

इनका मूलमंत्र यही है:-
कब्जा, कब्जा और कब्जा करना!
सदैव इनके हिंसा के लिये तत्पर रहने का यही मुख्य कारण है। हिंसा से इनको तो लाभ ही लाभ है। लाभकारी नीति को भला कोई क्यों बदलेगा?
जब तक सामने वाले इस बात को समझकर हिंसा का प्रतिहिंसा से इनके लाभ को असहनीय नुकसान में न बदल दें, ये अपनी नीतियाँ को भला क्यों बदलेंगे?
विश्व के किसी भी कोने में जाकर देख ले तो इन लोगों ने सब जगह आतंक का रायता फैला रखा है।
जब तक इनके ऊपर कोई चौटरूपी योजना नहीं बनेगी तब तक यह अपने लक्ष्य में कामयाब ही रहेंगे।
यह स्नेह-स्नेह अपना कार्य करते हुए अंत मे इतना बड़ा धमाका कर देते है कि सबकुछ तबाह हो जाता है
इसलिए जिनको भी इससे बचना है उनको खुद की रणनीति तय करनी ही होगी।
आप तबतक ही सुरक्षित है जब तक कि इनसे सावधान है।

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