जातिगत जनगणना राजनीति

जाति जनगणना- भाग 1
देश में लगभग 30-35 जातियां ऐसी हैं, जिनका देश की कुल जनसंख्या में 1% से अधिक है।
इन्हें हम बड़ा जातीय वर्ग कह सकते हैं।
इनमें से 23% मुसलमान, 2% ईसाई, निकाल दें तो शेष 75% में वनवासी, एस सी, ओबीसी, सवर्ण, जैन, बौद्ध, सिक्ख, हिंदुओं के सभी बड़े वर्ग इत्यादि हैं।
इन बड़े वर्गों को जोड़ दें तो उनकी जनसंख्या लगभग 40% होगी।
अनुमान के अनुसार
मुसलमान, ईसाई इति = 25
बड़े सवर्ण वर्ग।         =15
बड़े ओबीसी वर्ग       =12
बड़े एस सी वर्ग।       =8
बड़े एस टी वर्ग         =5
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कुल बड़े वर्ग योग% =65
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शेष 35% में देश की वह जनसंख्या है जिनका जातीय प्रतिशत 1% से भी कम है।
ये 35% वह जनसंख्या है जिनका प्रतिशत 1 से भी कम है। ऐसी जातियों की संख्या लगभग 5000 है। ये अपने अपने वर्ग में उस वर्ग के “बड़े जातीय समूहों” के बीच पिस रहे हैं। उदाहरण के लिए ओबीसी में कुल 12 बड़ी जातियां होनी चाहिए, जबकि लगभग 4000 छोटे जातीय समूह हैं। यहाँ समूह से तात्पर्य है जिनमें परस्पर रोटी बेटी का व्यवहार होता है।
तो ये जो अत्यंत छोटे समूह हैं, जिनकी जनसंख्या बहुत कम है, वोटबैंक की राजनीति में इन्हें कुछ भी नहीं मिलता। ये सर्वथा बड़ी जनसंख्या वाली जातियों की दया पर निर्भर है।
जाति गणना दरअसल देश में कुछ बड़े जातीय समूहों की दादागिरी और वर्चस्व स्थापना का चोंचला है, क्योंकि कुछ भी हो कोई भी जाति सबसे बड़े जातीय वर्ग “मुस्लिम” (23%) से बड़ा नहीं है। ये सब आंकड़ेबाज चुनाव से पहले कागजों पर कुछ लकीरें खींचकर समीकरण चर्चा कर रायता फैलाने का ब्लैकमेलिंग खेल भर है।

सबसे बड़ी बात, जाति अनुसार जनगणना का शोर मचाने वाले सभी लोगों की अपने स्वयं के परिवार में ही एकता नहीं है। या तो इन्होंने अंतरजातीय विवाह किया है, या ये अपनी जाति में कोई बड़ा काण्ड करके छिटककर किसी दूसरे स्थान पर शटल होकर राजनीति कर रहे हैं। अधिकांश कोर्टकेस में अपने ही भाई बंधुओं को लपेटे हुए हैं अथवा इनके कारनामों के कारण इनकी जाति को नीचा देखना पड़ा अथवा वह अलग थलग हो गई। सदैव उनकी राह में रोड़ा अटकाते हैं।
ये जिस जातीय जनगणना की बात कर रहे हैं, उसके आंकड़े सामने आते ही उसके आधार पर एक नया आंदोलन खड़ा करेंगे। उदाहरण के लिए मान लो, देशभर में यादवों की जनसंख्या 1% है लेकिन ओबीसी का आंकड़ा 40% आता है तो यादव 40% को अपनी बपौती मानते हुए दादागिरी करेंगे।
आज जबकि हिन्दू वोटबैंक के रूप में हमारे सामने एक निर्णायक विकल्प खड़ा है, अपनी अपनी जाति की पिपहरी बजाना आसन्न संकटों से आँख मूंदकर आत्मघाती कदम उठाना है।

Lalu Singh Sodha
[email protected]
www.lalusodha.com

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