हिंदुओं के अनेक मत, पंथ, सम्प्रदाय और खूब सारे देवी देवता हैं।

जो व्यक्ति यह मानते हैं कि, हिंदुओं के अनेक मत, पंथ, सम्प्रदाय और खूब सारे देवी देवता हैं, अतः यह विविधता उनकी एकता में बाधक है और इसलिए वे एकेश्वरवादी इस्लाम और ईसाइयत से कमजोर पड़ते हैं।
उनके लिए यह आलेख है।
मनुष्य करोडों हैं, सबकी रूचि प्रकृति भी भिन्न है। सभी मनुष्यों में समान शारीरिक अंग होते हुए भी प्रत्येक दूसरे से भिन्न है।
अतः उनका आध्यात्मिक स्तर भी भिन्न भिन्न होता है।
इसलिए आदर्श स्थिति यह है कि जितने मनुष्य उतने ही उपासना पंथ होने चाहिए। हरेक मनुष्य की कल्पना और अनुभूति का स्तर भी अलग अलग होता है अतः जितने मनुष्य उतने ही देवता होने चाहिए। यदि एक मनुष्य एकाधिक देवताओं के प्रति श्रद्धावान है तो देवताओं की संख्या मनुष्यों से भी ज्यादा होनी चाहिए। स्वामी विवेकानंद से जब किसी ने यह प्रश्न किया तो उन्होंने उक्त आशय का उत्तर दिया। आधुनिक हिंदुत्व के उनसे बड़े व्याख्याकार कोई नहीं, अतः स्वामीजी के इस गम्भीर कथन पर विचार करना चाहिए। ईसाई यीशु को एक मात्र परमेश्वर पुत्र और इस्लाम मुहम्मद को एक मात्र रसूल मानने पर बाध्य करता है। वहाँ आपकी कल्पना और अनुभूति के विस्तार की गुंजाइश को समाप्त कर दिया गया है। बात यदि दुनिया में गिरोह बनाकर गुंडागर्दी मचाने की होती तो यह बात जरूर लोकलुभावन लगती है किन्तु यहाँ तो मनुष्य के इहलोक, परलोक और समूची सृष्टि के उन्नयन की है तो उस सन्दर्भ में सर्वाधिक विकल्प उपलब्ध कराने वाली जीवन पद्धति हिंदुत्व ही है। अतः हिंदुओं में अपने मताग्रह के लिए तलवारबाजी कभी नहीं हुई। दुनिया को एक ही लाठी से हाँककर, हिला हिलाकर, मारकर, पीटकर, दबाकर या डरा धमकाकर अपनी बात मनवाना न केवल सभ्यता के विपरीत है, यह स्वयं मनुष्य की प्रकृति के भी विपरीत है। अत्यंत अवैज्ञानिक भी।
जहां ऐसा भयंकर मताग्रह और दादागिरी होती है वहाँ शीघ्र ही अंतर्विरोध पैदा होते हैं।
जैसे अनेक साम्राज्य आज स्मृति शेष हैं, अनेक शक्तिशाली राजनीतिक दल आज नाम मात्र के अवशेष हैं वैसे ही ऐसे दुराग्रही पंथों का आशुविनाश अवश्यम्भावी है।
वे काम ही ऐसा कर रहे हैं।
वे मानवप्रकृति के विरुद्ध, अनुचित वाद चलाने का गुट खड़ा कर रहे हैं, जो अपने ही कर्मों के बोझ तले दब जाना है।

जबकि हिन्दू धर्म, जिसके सभी भारतीय संस्करण- सनातनी, जैन, बौद्ध, सिक्ख, वनवासी इत्यादि इस भयानक अलगाववादी वृत्ति से निरपेक्ष हैं।
इस हेतु उनमें जिन प्रमुख साझा तत्वों को स्वीकार किया गया है, सदाचार, गुरु परम्परा, त्याग, नदी-तीर्थ उपसेवन, सत्संगति, तप,स्वाध्याय, राष्ट्रीय एकता इत्यादि में आश्चर्यजनक गजब की समानता है और प्रत्येक को रूचि के अनुसार ढेरों विकल्प उपलब्ध है।
हिंदुत्व को समझना है तो ईसाइयत या इस्लाम के चश्मे को उतारना होगा और तुलनात्मक बुद्धि को एक तरफ रखना होगा।
अपने सिद्धांतों के प्रति दुराग्रही एक अन्य प्रच्छन्न पंथ भी है- मार्कसिज्म
उक्त तीनों ने दुनिया में भयंकर दादागिरी और उत्पात मचाकर भीषण नरसंहार किये हैं।
अतः यह सोचना कि हमारी विभिन्नता हमारी दूषण है, एक गलत सोच है।
वास्तविकता यह है कि एकमात्र हमीं दुनिया में पापाचारी प्रदूषण से मुक्त, प्राकृत, समरस और अत्यंत वैज्ञानिक पथ के अनुगामी है।
हम ही सनातन हैं।
हमारी विविधता हमारा भूषण है।
जैसे गुंडों के नियम गुंडों पर ही लागू होते हैं, सभ्य समाज उनसे पृथक अपने नियमों से चलते हैं वैसे ही विगत शताब्दियों में उभरे इन विविधता-रहित मताग्रही गुटों से हमको कोई मतलब नहीं है। वे अपने घर में लड़ें- मरें, हमको क्या?
मगर हम उनके नियमों के कारण अपनी सभ्यता कदापि नहीं छोड़ सकते।
यदि वे अपने गुट की प्रक्रिया के अनुसार इधर भी अनुशासन भंग करते हैं तो मार खाएंगे।
हमें तो गर्व होना चाहिए कि हम इस पवित्र परम्परा में जन्मे और निरन्तर आगे बढ़ रहे हैं।
उन खूनी गुटों में पिसते अभागे मनुष्यों के पुण्यों का उदय जिस क्षण होगा, वे भी उन्हें लात मारकर अपने मूलस्वरूप की पहचान हेतु दौड़े आएंगे।
बहुत जल्दी यह स्थिति बनने वाली है।
केवल द्रष्टा बनकर प्रतीक्षा ही तो करनी है।

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