अग्निपथ का विरोध द्वारा इकोसिस्टम का प्रयास…

अग्निपथ अभी तो योजना का पूरा प्रारूप सामने ही नहीं आया और विपक्षी लोग गांव देहात में भ्रमित करने में सक्रिय हो गए हैं।
ऐसे प्रचारित किया जा रहा है मानो नौकरी लग भी गई, 4 साल हो गए और आज एक एक को ठेल कर घर भेजा जा रहा है।
उन्हें कुछ बातें समझ लेनी चाहिए।
यदि देश में फिर से कंगी सिस्टम की सरकार आ गई तो इसका हश्र निश्चित रूप से वही होना है जो सरकारी हॉस्पिटल, संविदा टीचर या इंजीनियरिंग, बीएड कॉलेजों, मनरेगा का हुआ है, लोग नाम लिखा देंगे, भत्ता और सर्टिफिकेट लेते रहेंगे।
लेकिन भारतीय सेना कभी भी सरकार का ऐसा दखल पसंद नहीं करती है, यह उसकी सबसे बड़ी विशेषता है कि गुणवत्ता में कभी समझौता नहीं करती, वहाँ कैम्पस में सिविलियन को घुसने तक की पाबंदी होती है।
इसलिए चयन प्रक्रिया वही होगी जो अभी है। यानि सबसे फिट लोग, पूर्ण योग्यता धारी ही प्रविष्ट होंगे।
अभी मान लो 1600 मीटर दौड़ 7 मिनट में पूरी करनी होती है, लेकिन भर्ती रैली में इतनी भीड़ उमड़ती है कि छंटनी का पहला माध्यम ही दौड़ है तो जो रस्सी 7 मिनट के बाद खींची जानी चाहिए, उसे साढ़े 6 मिनट बाद ही खींच लिया जाता है और 250 लोगों के बैच में मुश्किल से 10-20 ही उसे क्रॉस कर पाते हैं।
अब हो सकता है उसे ठीक 7 मिनट पर ही खींच लिया जाए और तब यह संख्या 50 के आसपास होनी चाहिए।
दूसरा भ्रम पदों की संख्या को लेकर है, उसमें बिल्कुल कटौती नहीं की जाने वाली। मान लीजिए पहले यदि 100 पदों की भर्ती थी तो अब वहाँ 400 लिए जाएंगे। हर 6 माह में भर्ती निकाली जाएगी। इनकी कुछ माह ट्रेनिंग होगी और फिर उस अवधि सहित 4 साल की सर्विस होगी।
वास्तव में इसे सर्विस नहीं, 4 वर्ष की ट्रेनिग , स्कूलिंग या इंटर्नशिप मान सकते हैं जिसमें उक्त भत्ता आदि मिलेगा, सैनिकों वाले कार्य करवाये जाएंगे स्किल डेवलपमेंट भी होगा और 4 वर्ष की समाप्ति पश्चात इनमें से श्रेष्ठ और इच्छुक 100 को नियमित सैनिक के रूप में रखकर शेष को प्रमाण पत्र, धन इत्यादि देकर भेज दिया जाएगा।
ट्रेनिंग और लम्बी सर्विस को लेकर कई बातें हो रही है। मेरे बहुत सारे मित्र सेना में है। इसकी ट्रेनिंग बहुत कठोर होती है जिसमें अच्छे अच्छे लड़के रो देते हैं। ट्रेनिंग में शरीर का जूस निकल जाता है, विशुद्ध बॉडी ही शेष बचती है। इतनी सधी हुई और त्वरित दिनचर्या होती है कि और कुछ करने का अवसर ही नहीं होता। ऐसा शायद ही कोई होगा जो ट्रेनिंग पीरियड में एक बार वापस आने का मन न बनाये। इनका वश नहीं चलता अन्यथा जो टॉप है, उनमें से भी अधिकांश को यदि मौका मिले तो वे वापस आना चाहेंगे। इस तपस्या में शांतिप्रिय वाले तो बिल्कुल ही फिसड्डी होते हैं। सामान्यतः किसान, मजदूर, जाट, गुर्जर, राजपूत, आदिवासी इत्यादि उसे पूरी करते हैं।

सैनिक

अधिकांश सैनिक समयपूर्व ही वापस लौटने के इच्छुक होते हैं। जो सैनिक सर्विस कर रहे होते हैं वे भी वापस इसलिए नहीं आ पाते कि वे बॉन्ड से बंधे होते हैं, स्वयं तो आना चाहते हैं लेकिन सेना नहीं आने देना चाहती।
अधिकांश सैनिक अपनी सर्विस के एक एक दिन को गिनकर गुजारते हैं। उन्हें बहुत हार्ड, समयबद्ध और सजग ड्यूटी देनी होती है।
ऐसे में यदि उन्हें 4 वर्ष बाद घर आने का अवसर मिलता है तो 400 में से 350 तो यूँ ही खुशी खुशी वापस रवाना हो जाएंगे।
यह अब सेना पर है कि वह उनमें 100 लोगों को कैसे रोकती है। यहाँ मामला उल्टा है, जैसा कि उसे रोजगार से जोड़कर प्रचारित किया जाता है कि उनका भविष्य क्या होगा, वैसा नहीं है।
अब रही बात, इन ट्रेंड सैनिकों के दुरुपयोग की, तो कम से कम वहाँ ये वामपन्थी यूनियनबाजी बिल्कुल नहीं चलने वाली। इनके लायसेंस रिन्यू या वार्षिक हाजिरी जैसी कोई न कोई व्यवस्था अवश्य होगी। क्योंकि सेना कभी अपने सैनिकों को अकेला नहीं छोड़ती।
दूसरी बात, यदि इन 4 वर्षों के कार्यकाल को किसी डिग्री, डिप्लोमा से जोड़ दिया और समकक्षता दे दी, जिसकी कि प्रबल संभावना है तो उन 300 लोगों के सामने तत्कालीन केंचुआ बेरोजगार की अपेक्षा कई गुना अधिक अवसर विद्यमान होंगे।

केंचुआ बेरोजगार वे लोग जो आंखों पर चश्मा लगाए, शहरी परिवेश में पले, थुलथुल रीढ़ विहीन शरीर लिए, मां बाप की इकलौती सन्तान है और जिनकी 25 बरस की उम्र में भी चड्डी उनकी मॉम धोती है।
वैसे एक ठूंठ बेरोजगार भी होते हैं जो इधर उधर से फर्जी कॉलेजों में केवल डिग्रियों बटोर रहे हैं और नशा, वासना, आधुनिकता के व्यामोह में फंसकर, किसी जातिवादी ग्रुप में जुड़कर, नेताओं के चक्कर में पड़कर किसी फर्जीवाड़े की ऐस में दिन काट रहे होते हैं।
इन दोनों प्रजातियों की अपेक्षा सैनिकों का भविष्य बहुत बहुत उज्ज्वल होगा।
और यदि राज्य सरकारों ने और प्राइवेट कंपनियों ने अपने विभिन्न विभागों में ट्रेंड, अनुशासित कार्मिकों की डिमांड की, जिसकी कि प्रबल संभावना है तो फिर इनके बल्ले बल्ले ही हैं।
भला ऐसा कौनसा विभाग या समूह होगा जो ये न चाहे। आज्ञापालन एक बहुत बड़ा गुण है, जिसकी सर्वाधिक कमी भारतीय समाज में है और जो सैन्य प्रशिक्षण से ही विकसित होता है।
मैं तो यह कहूंगा कि सेना पर ऐसी खेप देने का दबाव इतना बढ़ जाएगा कि लगभग हर दूसरा युवा इसमें जाना चाहेगा और वैकेंसी बढ़ानी पड़ेगी। बहुत जल्दी ये ट्रेनिग सेंटर स्कूलों का रूप धारण करेंगे और पुराने सैनिक कठोर मास्टर बने नजर आएंगे।
अब बात करते हैं, नक्सली, आतंकी में इनके शस्त्रास्त्र प्रशिक्षण के दुरुपयोग की, तो वह कदापि सम्भव नहीं। सरकार में समानांतर अन्य प्रयत्न, जैसे अपराधियों का डाटा कलेक्शन वगैरह भी चल रहा है। भविष्य में टेक्नोलॉजी के प्रयोग से इसकी संभावना शून्य हो जाएगी।
सेना की एक और विशेषता है राष्ट्रीय एकता में इसका बहुत बड़ा योगदान होता है। प्रशिक्षण अवधि में भाषा, प्रान्त, जाति, मजहब इत्यादि भेद विगलित हो जाता है। केवल एक ही धर्म बचता है, कर्त्तव्य पालन का।

एक सैनिक केवल सैनिक होता है, बाकी सारा नाम, रूप पहचान घिस जाता है। जिस वर्ग पर इसे लेकर संदेह जाहिर किया जा रहा है, पहली बात, इसमें चयन होना कोई हँसी खेल नहीं। हो भी गया तो “उस टाइप” के कट्टर मजहबी, जो मुल्ला मौलवी से ऑपरेट होते हैं, वे यहाँ निभ ही नहीं सकते। कभी के जूते मारकर भगा दिए जाएंगे।
आप सेना के मैस की दाल की ताकत नहीं जानते, वह मंदिर के प्रसाद से भी ज्यादा चमत्कारी होती है। प्रशिक्षक की गालियां सीधे बुराई पर चोट करती है, उसमें वह उज्जडपन, जाहिलियत, कट्टरता, गंदगी कब की भस्म हो जाती है।
कभी कभी मुझे लगता है, सेना की ट्रेनिग की अधिक जरूरत कट्टर मझबियों को नहीं, इन केंचुओं और ठूंठ परजीवियों को हैं क्योंकि देश के पैरों में बंधी बड़ी बड़ी बाधाएं ऐसे “मां के लाडले” या कंगारू बॉय हैं जो कभी किसी मुख्यधारा में जम ही नहीं पाते और वामपंथियों की खुराक बन जाते हैं।
अंत में एक बात और, समाज को स्वस्थ, समर्थ, सुंदर, युवा मिलेंगे। उनकी ताकतवर और परिश्रमी संतानें होंगी तो समाज स्वयमेव सबल होगा। लवजिहाद में स्वतः कमी आएगी क्योंकि अधिकांश ऐसे मामलों में दैहिक अतृप्ति में हिन्दू युवकों की अक्षमता भी है। गोलगप्पे, सोया आयल और आलू खाकर पल रही पीढ़ियों के पास कोई क्यों कर आएगा, जब शरीर में स्टेमिना ही नहीं है। भारतीय नवयुवकों में पौरुष हीनता और वामपंथी यौन विकृतियां किस स्तर तक हावी है, कहने की जरूरत नहीं। बाकी संकेत से समझ जाएं।

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