आएगा तो योगी ही…

पश्चिमी राजस्थान की एक बारात में जाने का अवसर मिला। एक बस और बहुत सारे छोटे छोटे वाहनों में बारात चली। लगभग 70km का मार्ग तय कर जहां जाना था वहां पहुंचे। वर की गाड़ी बीच मे चल रही थी उसके साथ कैमेरा वाले और दो असिस्टेंट टाइप लड़के थे, ये लोग मार्ग के विभिन्न देवस्थानों पर गाड़ी रोकते, वर यानि दूल्हा उतरता फिर वह कुछ पूजन नारियल इत्यादि चढ़ा कर वापस गाड़ी में बैठ जाते। साथ में ढोली, सारंगी वाले भी ढम ढम और पूं पा करते इस तरह लगभग दो घण्टे बाद बारात नियत गांव पहुंची।
सभी गाड़ियां साइड में लगाकर सभी बाराती नीचे उतरे। वहां वधूपक्ष के लोग स्वागत हेतु तैयार बैठे थे। एक व्यक्ति के हाथ में एक थाली थी जिसमें चूरमा (घी गुड़ के साथ चूर्ण की हुई रोटी) जेसा कुछ था जिसे सभी स्पर्श कर रहे थे। शादी विवाह के अवसरों पर बारातियों के साथ अतृप्त आत्माएं और बुरी शक्तियां लग जाती हैं, ऐसा करने से यदि कोई बुरी शक्तियां हैं तो वे इस रोटी में उतर जाती हैं और वरयात्री पवित्र और निरापद हो जाते हैं। पुराने समय में रोटी के बजाय कोई बकरा काटा जाता था और उसके रक्त में पैर का अंगूठा डुबोया जाता था।
इसके बाद सभी बारातियों को एक बड़े कक्ष में बैठाया जाता है, उसके पास ही एक छोटा कक्ष होता है जिसमें वर और उसकी मित्र मंडली बैठ जाती है।
यह जो बड़ा कक्ष है, इसमें पहले से ही 40-50 लोग बैठे थे। इनके साथ लगभग 100 बाराती भी आकर बैठ जाते हैं। नीचे फर्श पर दरी बिछी हुई होती है, दीवार के सहारे बड़े बुजुर्ग और बाकी खाली जगह पर बाकी लोग बैठ गए।

फिर अचानक एक चमत्कार जैसा होता है। एक तो सर्दी का मौसम, ऊपर से सभी खिड़कियां बन्द, केवल एक दरवाजा है जिस पर घरातियों ने घेरा लगाया हुआ है। वे चाय आदि लाकर सबको मनुहार करते हैं। इस अवसर पर जो चाय नहीं पीते वे भी पीने लगते हैं।
अब चमत्कार की बात करते हैं।
जो चार-चार, पांच-पांच के समूह में बाराती होते हैं उनके बीच में आठ दस बंडल बीड़ी, सिगरेट और माचिस के पैकेट रखे होते हैं।
एक व्यक्ति हाथ आगे करता है, बंडल खोलता है, उसमें से मनपसंद बीड़ी का चयन करता है, उसे फूंक मार कर जायजा लेता है, फिर माचिस खोलता है, तीली सुलगाता है, तीली से बीड़ी को टच कर खींचता है, एक जोरदार भभके के साथ बीड़ी स्टार्ट हो जाती है, वह व्यक्ति तीली को बुझाता है, सामने की दरी पर उसे मसल कर निष्क्रिय करता है और इस तरह से समाधिस्थ सा अनुभव करता है।
लगभग सभी बाराती बीड़ी, सिगरेट आदि सुलगाते हैं और बड़े बड़े कश लेकर धुंआ छोड़ते हैं। 150 लोगों में से लगभग 100 लोग धड़ाधड़ बीड़ी पर बीड़ी, सिगरेट पर सिगरेट…. पूरे कक्ष में घनघोर धुंआ भर जाता है। पूरा कमरा ही गैस चैम्बर बन चुका है। धुंए के गुब्बारों के बीच जो बीड़ी नहीं पीते उनका जी मिचलता है। लेकिन मजाल जो कोई मुंह से उफ भी करे। ये लोग भी धुंआ गटकने लगते हैं। फिर जिनका जी मिचलता है वे भी बेचैनी मिटाने के लिए बीड़ी,सिगरेट सुलगा देते हैं। अब पूरा कमरा ऐसे लगता है जैसे अंदर आग लगी हो। कोई खांस रहा है कोई जोर जोर से कहकहे लगा रहा है और इन सबके बीच धड़ाधड़ बीड़ियाँ सुलगाई जा रही है।
फिर बीड़ी, फिर चाय, फिर खांसी, फिर से एक बीड़ी…. बीड़ी पर बीड़ी। ऐसा लगा ये दूल्हा ब्याहने नहीं बीड़ी पीने ही आये हैं।
“क्या आपका दम नहीं घुट रहा?” मैंने एक आदमी को पूछा। कमरे में कोलाहल इतना था कि वह सुन नहीं सका। उसने मुँह की बीड़ी हाथ में ली और मुँह को मेरे बिल्कुल पास लाया। मैंने वही बात जोर से दुहराई। उसने सुना और मनन करने के लिए फिर से सुट्ट मारी भरपूर धुंए का एक गोट मेरे ऊपर छोड़ कर बोला “आएगा तो योगी ही!”

मैं सोच रहा था आज इस कमरे में कोरोना का कोई वायरस शायद ही जीवित बचा है। पूरा कमरा धुंए से सेनेटाइज्ड हो गया है। हिटलर के गैस चैम्बर में यदि इन्हें डाल दिया जाता तो निश्चित ही ये जीवित बाहर आते। धन्य है इनकी सहनशक्ति, धन्य है इनकी विषपान की क्षमता।
थोड़ी देर बाद भोजन आया। सबने भोजन किया और एक बार फिर सुट्टाम्सुट्टा

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