गौ हत्या के पाप का उपाय

गौशाला

राज्य और केंद्र सरकार को एक अध्यादेश लाना चाहिए जिसमें गायों का रखरखाव और सरकारी धन से गौशालाओं की व्यवस्था में केवल उसी वर्ग और समुदाय को रखना चाहिए जिनमें गाय को माँ मानने की परम्परा है।
जिन मजहबों में गौ मांस खाया जाता है उन मजहबों के लोगों को न तो किसी समिति में रखना चाहिए और न ही कर्मचारी।
क्योंकि इनमें गायों के प्रति वैसा सेवा भाव कभी नहीं आ सकता जैसा उसे माँ मानने वालों के हृदय में रहता है।
सरकारी अनुदान, गौशाला खोलने की अनुमति और गौशाला रख रखाव समिति में कठोरता पूर्वक इस नियम का पालन करना चाहिए।
जैसलमेर बाड़मेर में जगह जगह चारागाह हैं जिनमें लोग अपनी गायों को मुक्त विचरण के लिए छोड़ देते हैं।
इन चरागाहों में यदि पानी की पूर्ति हो जाती है तो फिर किसी भी गौशाला की जरूरत नहीं रहती।
अभी खेल यह हो रहा है कि इन गौशालाओं पर परिवार विशेष, पार्टी विशेष और समुदाय विशेष का कब्जा है।
ये लोग उन गायों को गौशाला में बंदी बनाकर रखते हैं और अनुदान प्राप्त करते हैं। बाद में उन्हीं गायों का पशु बीमा करवाकर स्वयं की बताकर क्लेम भी प्राप्त करते हैं।
इतना ही नहीं, आशंका यह भी है कि इन्हें बाहर सप्लाई भी किया जाता है। पर्यटन सीजन में मांस की आपूर्ति के लिए भी इनका उपयोग किये जाने की आशंका है।
जब गायों को दर्दनाक मौत देकर बीमा राशि उठानी है या गौमांस के लिए उनको काटना है तो काहे की गौशाला।
इतना घृणित कार्य भारत देश मे, हम हिंदुओं के जीवित रहते, हमारी नाक के नीचे, प्रशासन और सरकार के सहयोग से डंके की चोट पर खुलेआम हो रहा है तो लगता है हम भारत नहीं, किसी इस्लामिक कंट्री में रह रहे हैं।
यह हालात तब है जब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बहुमत के संकट से गुजर रही है और देश में हिन्दू जनसंख्या 75% है।
आप कल्पना कीजिए, जिस दिन कांग्रेस पूर्ण बहुमत में होगी और भविष्य में हिन्दू जनसंख्या कम होगी तो क्या क्या हो सकता है?

गौशालाएं

हम बजरंग दल के कार्यकर्ता ओरण गोचर की पुनः बहाली, संरक्षण के आंदोलन का समर्थन करते हैं, और प्रशासन से मांग करते हैं कि प्रदेश की सभी गौशालाओं, उनकी समितियों, विगत 5 वर्षों में उन्हें प्राप्त अनुदान की ऑडिट और जांच की जानी चाहिए।
गाय केवल पशु नहीं है, न ही यह कोई कमाई का साधन है। यह हमारे जीने मरने का प्रश्न है। यह केवल लाभ कमाने की भी बात नहीं है, गायों को बाड़े में बन्द कर कुत्तों से भी बदतर स्थिति में मरने के लिए छोड़ देना मजहबी और राजनीतिक शरारत है।
यह सम्पूर्ण हिन्दू समाज को उकसाने और चिढ़ाने का षड्यंत्र है। याद रखिये, कुछ मामले बहुत संवेदनशील होते हैं, इस मामले में यदि दंगे भड़क जाते हैं तो उसकी सम्पूर्ण जिम्मेदारी प्रशासन और गौशाला संचालकों की है।

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