भागवत जी के बयान से सहमत हूँ।

मोहन जी भागवत

यह एक लिटमस टैस्ट है।
इसका उपयोग मैं अपनी मित्रता सूची अपडेट करने में कर रहा हूँ।
इससे पहले कि मैं आपको अमित्र करूँ, आप स्वयं भी “पधार” सकते हैं।
बाकी, “कन्धे से कंधा मिलाकर” तुम कितना लड़ोगे, हम पहले ही जानते थे।
बस मन रखने को हूँ हाँ कर लिया करते थे।
काफी समय से, ब्राह्मण विक्टिम कार्ड खेलकर योगीजी हेतु कांटे बिछाने पर, जाट विक्टिम के नाम से किसान आंदोलन, मराठा आरक्षण, (याद कीजिए पटेल आंदोलन, राजपूत आंदोलन, जिग्नेश मेवानी,) ऐसे बहुत सारे उपक्रम हैं, जो हिन्दू विरोधी टूलकिट ग्रुप द्वारा धीमे धीमे बीज छिड़के जा रहे थे, देख समझ हम भी रहे हैं, बस चुप थे।
दरअसल, विभिन्न सम्प्रदायों और जातियों से मिलकर हिन्दू समाज बना है।
लेकिन जब जाति का इस्तेमाल राजनीति में होने लगता है तो वहाँ एक विचित्र टकराव की स्थिति बनती है।
सच्चे हिंदुओं से निवेदन:-
विचलित होने की जरूरत नहीं है, यदि धर्म पर आस्था सच्ची है तो अपने कर्त्तव्य कर्म पर अटल रहो, इस भ्रम से बाहर निकलो कि योगीजी हमारी जाति के नहीं है।
अगर समझते हो कि राजनीति कोई समाधान है तो इस भ्रम से बाहर निकलो, भागवत जी ने यही तो कहा है कि राजनीति जोड़ती नहीं तोड़ती है। मुसलमानों के बारे में कही गई बात संघ का आरम्भ से ही यही स्टैंड है। कोई नई बात नहीं कही है। कोई पहाड़ नहीं टूटने वाला। और मैं जानता हूँ, प्रथम प्रकार के लोगों की संख्या मुश्किल से 1% ही है। यह लोकतंत्र है, यहाँ संख्याबल चलता है। पहले ही काफी पिस चुके हो, छिटक कर अलग हो गए तो कोई नहीं पूछने वाला। अपनी दाल रोटी खाओ मस्त रहो।
मंदिर और शास्त्र को लेकर दुबले होने की जरूरत नहीं है। मंदिर और शास्त्र रहते हुए भी देश गुलाम हुआ था, यह सच्चाई है। लड़ने वाले लड़े और उन्होंने अपना सर्वस्व खोया। आजादी के बाद भी उन्हीं को खलनायक बनाकर कुछ चतुर लोग लोकतंत्र की मलाई खाते रहे।
दुनिया भर में एक ट्रेंड चला है कि 2000 वर्ष पहले हम कौन थे?
लोग अपनी पुरातन जड़ें खोज रहे हैं।
रावण की कैद में सीता की भांति मजहबों की बेड़ियों में जकड़े वे लोग इस फंदे से निकलने के रास्ते तलाश रहे हैं।
उनको मुक्त होने दीजिए। वे मुक्त होंगे तभी आपकी संख्या बढ़ेगी।
उनकी मुक्ति के द्वार खोलिए। जितने सम्भावित दरवाजे हैं, सभी खोलने होंगे। दरवाजे खुलते ही कुछ समस्याएं आएंगी। समस्याएं कब नहीं थी?
आएंगी तो सुलझाएंगे
नाक भौं चढ़ाने से कुछ नहीं होगा।

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