बोर्ड एग्जाम कैंसल हो गए।

छात्रों की जान बचाना जरूरी है क्योंकि भविष्य में तीसरी लहर बच्चों पर केंद्रित होने की संभावना है।
वैसे एग्जाम कैंसल के बयान की पहल कर केजरीवाल केंद्र के लिए दुविधा खड़ी करने के मूड में था लेकिन वह सब धरा रह गया, उस #समाजवादी_खेल की अलग से व्याख्या करेंगे।


झोला छाप वामपंथी जेएनयू के व्यभिचारियों द्वारा लिखित उटपटांग किताबों को पढ़ने से इतना नुकसान हुआ जितना नहीं पढ़ते तो फायदा होता।
देश को कोरोना के कारण पूरे दो बैच ऐसे मिल रहे हैं जिन्होंने इन गन्दे गलीच उबाऊ लोगों की कुटिल उलटबांसियों से दूरी बनाकर रखी, यह एक उपलब्धि है।
पाठ्यक्रम की किताबें कह कहकर भारतीय बालकों का विगत दो दशक तक भयंकर शोषण हुआ है। उनके जीवन निर्माण में इन किताबों का 10% भी योगदान नहीं है।
इससे कई गुना ज्यादा तो वे अपने मोबाइल से एक महीने में सीख जाते हैं।
भारत का स्कूली सिस्टम पढ़ाई कम और बच्चों के #आयु_अनुसार #जाति_अनुसार हिसाब किताब रखने का सिस्टम भर रह गया है।
ज्ञान पिपासु जन कहीं भी किसी भी परिस्थिति में सीखता रहता है।
एग्जाम कैंसल से 90% लोगों ने राहत की सांस ली है।


दुःखी कौन हैं?
एक तो वे चश्मिश चतुरलिंगम जो खुद को डेढ़ हुशियार समझते थे और जिनको लगता है अधिकतम अंक लाकर इधर उधर से बधाई पाना ही जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि है।
दूसरी वे मॉम, जो अपनी पढ़ाकू गुड़िया के टेलेंट का उपयोग पड़ोसन वर्माइन और गुप्ताइन पर धौंस जमाने के लिए करना चाहती थी।
तीसरे वे निजी स्कूल संचालक जो इन आंकड़ों को अखबार में छपवाकर अपने इंस्टीट्यूट की दुकानदारी का भारी विज्ञापन कर निरन्तर धन कूट रहे हैं और एजुकेशन के नाम पर दुनिया को मूर्ख बना रहे हैं। इस निर्णय से अब सरकारी बच्चे और टॉम बच्चे बराबरी पर आ गए हैं।
और सभी जानते हैं कि अच्छा ग्रेड कैसे आता है, दो तीन जगह पीछे से ढंग का पुश लगते ही 90 क्रॉस कोई बड़ी बात नहीं है।
नई शिक्षा नीति लगने के बाद यह सब आम बात हो जाएगी कि कौन कब परीक्षा दे रहा है अथवा नहीं दे रहा है।
वैसे भी 99% बच्चों को 12वीं के बाद बेरोजगारी भत्ते के लिए ही आवेदन करना होता है। सभी प्रमुख उपयोगी कोर्स के लिए एंट्रेंस एग्जाम होता है। बाकी लड़के कॉलेज में नाम लिखा देंगे, साल भर लल्ला लल्ली खेलेंगे और फिर वनवीक पढ़ बेरोजगारी का रोना रोयेंगे, इस “महान परम्परा” में कोई विघ्न नहीं आने वाला।
मेरी दृष्टि में, यदि भारत में किसी बच्चे का वास्तविक अंकीय मूल्यांकन करना है तो उसके कक्षा 6,7,9 और 11 के अंकों का औसत निकाल दें, वही उसके एकेडमिक केरियर का सर्वश्रेष्ठ मूल्यांकन है क्योंकि उसे वे अध्यापक करते हैं जो  निरन्तर उनके संपर्क में रहते हैं।
बाकी, अपने उस पूर्व बयान पर आज भी दृढ़ हूँ कि संसार वही लोग चलाते हैं, चला रहे हैं, जो औसत हैं अथवा जिन्होंने अपनी स्कूली पढ़ाई को कभी सीरियस नहीं लिया।

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