तृतीय विश्व युद्ध हिन्दू बहुसंख्यकों से…

प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) 4-5 साल चला!
द्वितीय विश्वयुद्ध (1939-1945) 5-6 वर्ष चला।
जीवाणु युद्ध के रूप में तृतीय विश्वयुद्ध आरम्भ हो चुका है।
जो इसे युद्ध न समझकर आरोप प्रत्यारोप का अवसर समझ रहे हैं उन कायर नपुंसक नासमझ लोगों का तो मर जाना ही श्रेयस्कर है।
दुनिया के सभी देश अत्यंत चौकन्ने होकर अपने शत्रुओं को समझ रहे हैं, रणनीति बना रहे हैं, अपनी सरकारों और तंत्र को मजबूत कर रहे हैं।
केवल भारत ही ऐसा है जहां आज भी बहुसंख्यक जनसमुदाय को न अपने शत्रुओं की पहचान है, न आसन्न संकट की कल्पना।
जहां विपक्ष और एक बड़ा वर्ग, लगभग खुलेआम, स्पष्ट रूप से देश की बर्बादी में पूरे मनोयोग से संलग्न है।
जहां अर्बन नक्सली पूरी ताकत से गृहयुद्ध की तैयारी कर रहा है।
जहां छोटे छोटे संयोग प्रयोगों से देश बचा सकने वाले लोगों की ताकत और सामर्थ्य मापी जा रही है।

जहां अनेक झुंड गड्ड-मड्ड होकर, घुलमिलकर शत्रु का काम आसान कर रहे हैं, वहीं जिनको बचना है, जो बचने चाहिए, जिनको बचाने के लिए कुछ लोग अपना सर्वस्व दांव पर लगाकर एक एक कदम सावधानी से उठा रहे हैं, वही लोग अपने संरक्षकों को पुरजोर गाली देकर हाय हाय करते हुए कपड़े उतार कर भौंपू के स्वर में रो धोकर शत्रु के ही काम को आसान कर रहे हैं, इस दृश्य को देख सृष्टि निर्माता ब्रह्मा भी चकित है कि अरे! ये कौनसी प्रजाति विकसित हो गई?
शिव शम्भू मन्द मंद मुस्कुरा रहे हैं कि इस मूर्ख को देखो, गड्ढे से निकलने की बजाय यह अपने उद्धारक को ही बलात अंदर खींच रहा है,  सृष्टि पालक विष्णु बहुत ही उद्विग्न मन से पश्चाताप कर रहे हैं कि मैं भी किसे बचाने निकला हूँ, जो रात दिन अपने ही नेतृत्व को मात्र इसलिए कोस रहे हैं क्योंकि वह इन्हें पूर्व नेताओं की भांति अंधेरे में नहीं रखता, गरीबी में रखकर जीवन निर्वाह की सामग्री की  लाइन में नहीं लगाता, दो जूते मारकर तीसरा नहीं मारने के उपकार की वाहवाही नहीं लूटता।
जिस दिन इस अभागे देश के दुर्भाग्यशाली जनों ने अपने शत्रु की वास्तविक पहचान कर ली और मित्र का अवलंबन पकड़ लिया उस दिन समझो तुम यह युद्ध जीतने के मार्ग पर चल पड़े हो।
तब तक तो सब धुंआ धुंआ ही है।

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