घोड़ी बनने के चक्कर में…

पीडीपी का प्रवक्ता कश्मीरी पंडित है।
धिम्मी समझना है तो यह पर्याप्त है।
“उनको” गरज ही नहीं फिर भी उनकी खोह में घुसे जा रहे हैं।
उन्होंने कहा ही नहीं फिर भी उनकी वकालत करते जा रहे हैं।
उन्होंने पूछा ही नहीं फिर भी उन्हें राय दिए जा रहे हैं।
एक बहुत बड़ा वर्ग है जो उनके लिए #करणजौहर आसन में सदैव झुका रहता है।
इन्हीं घोड़ियों पर जब कोई संकट आता है तो उनकी जाति वालों का जाति प्रेम जाग जाता है और फिर वे पूरी जात को ही घोड़ी बनने का आदेश देते हैं।
जो घोड़ी नहीं बनता उसे जातिद्रोही घोषित किया जाता है।
इन जातिवादियों की एक और विशेषता है, कारनामे ये करते हैं और आशा करते हैं कि दूसरी जाति वाले, जो #हिन्दू के नाते खड़े हैं, वे आकर उसे ठीक करे।
शर्म मगर इन्हें आती नहीं।
उल्टा लोग “अपनी जात वाला” मान कर सम्मान और देते हैं।
फिर भी गाली देंगे आरएसएस को। गलती बताएंगे संघ की। यदा कदा अलग संगठन बनाने का राग भी गाते हैं। ये समझदारी नहीं, घोर मूर्खता है। आत्ममुग्धता है। उस पँखविहीन मुर्गे की तरह जो नोचे जाने के बावजूद सैयाद का पीछा करता रहता है।
“वे बड़े लोग हैं इसलिए जो कर रहे हैं उचित ही होगा!” ये भी नासमझी है। इन कथित बड़े लोगों के सरनेम की हिस्ट्री पढिये जरा। जन्मपत्री निकालिए। दिल्ली में “दावा ए इस्लाम” चलाकर धर्मांतरण करने वाला मुफ़्ती “गौतम” लिखता था न!!
ये एक सरनेम लगाकर थोड़ा मीठा खट्टा क्या बोलते हैं कि जातिवादियों के स्तनों में बाल्टी भर दूध उतर आता है।
ज्यादातर कथित बड़े लोग “घोड़ी” बनकर ही बड़े बने हैं।
बड़े बनने के चक्कर में सेक्युलरिज्म का वजन ढोते रहे।
“उनकी” भी क्या गलती है?
तुम्हें घोड़ी बने देख वे चढ़ जाते हैं। घुड़चढ़ी उनका पुराना शौक है।
लेकिन घोड़ी बनने के चक्कर में, बड़ा बनने के चक्कर में, सेक्यूलर बनने के चक्कर में तुम दुम दबाते जिम्मी बन गए और अब अपने पूरे समूह को उसी खड्ड में गिराना चाहते हो।
यथा अन्धेन नयमाना: अंधा:!
इन जातिवादियों या अपनी जाति वाले नेताओं के चक्कर में सिवाय बेइज्जती के तुम्हारी कोई नियति नहीं।
चाहे बड़ा मठाधीश हो, पंडित हो, राजवंश का हो,नेता पुत्र हो, सताया हुआ कुपोषित हो, चाहे बड़का धर्माचार्य।
घोड़ी बनते ही उसके शेष सभी विशेषण, सभी उपाधियां समाप्त हो जाते हैं।
फिर भी यदि तुममें जातीय दम्भ बच गया है, अपनी जाति की चिन्ता है तो उन्हें प्रश्न करो कि क्यों तुम मेरी जाति का इस्तेमाल कर घोड़ी बने हुए हो।
छीन लो उनसे वह जातीय उपमा। तुम्हारी जाति का अपमान वे कर रहे हैं। पीछे सरनेम जाति का लगाकर गुलाम बने फजीहत करवा रहे हैं। यदि अपनी जाति की सच्ची भलाई चाहते हो तो उन्हें पूछिये कि जिस गोत्र का इस्तेमाल कर तुम नित्य धर्म की हानि और अधर्म का सहयोग कर रहे हो उसका अर्थ भी तुम्हें मालूम है?
मूर्ख, खोखले नकली आचार्य उनके महामूर्ख चेले, इन सबको दिक्कत मोदी से ही है, इनकी जबान राष्ट्र का काम करने वालों के विरुद्ध ही चलती है, बाकी जगह घिग्घी बन्ध जाती है, बिना उनके कहे, पूछे घोड़ी बनने को ये छास्त्र व्याख्या मानते हैं, धिक्कार है।
हर गली कूंचे में, आप लोगों की देहरी के उस पार ऐसे बेशर्म बदतमीज धिम्मी भरे पड़े हैं, जिनका रोज किश्तों में हलाला हुआ जा रहा है, कानों में चारों ओर से कर्कश कोलाहल गूंज रहा है, इंच इंच कर सिमट रहे हैं, गले से चूं तक नहीं निकलती लेकिन पर्वत पर धुंआ देखकर आग आग चिल्लाते हैं।
ऐसे धूर्त, कुमार्गगामी, कायर, नपुंसक, स्वार्थी और महातमोगुणी भ्रमित #अपनों के रहते शत्रु की जरूरत ही क्या है?
ये कोई जातिवीर नहीं, जातिवाद के पिछवाड़े से निकला कचरा है, “मातुरुच्चार एव च” मल हैं ये, टट्टी को सहेज कर नहीं रखा जाता, इनका विनाश होना चाहिए। तुम्हारे अस्तित्व की रक्षा के लिए इनका मरण नहीं होगा तो फिर किसका होगा?

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