आतंकियों को कौम का समर्थन…

काकोरी में जो दो लोग पकड़े हैं उनके पास प्रेशर कुकर बम मिले हैं। नौ एमएम का कट्टा भी।

चलिये, मान लेते हैं कि कट्टा छुपाया जा सकता है घरवालों से भी – माssss न लेते हैं, भरपूssssss र बेनिफ़िट ऑफ डाउट दे कर। लेकिन प्रेशर कुकर बम के लिए प्रेशर कुकर इस्तेमाल किया जाता है, जिसे छुपाना संभव नहीं। उतने साइज की वस्तु छुपा नहीं सकते,  घरवाले तो सवाल करेंगे ही कि यह क्या है क्यों लाये हैं।

सोच कर देखें, क्या आप अपने घर में एक प्रेशर कुकर लाकर छुपा सकते हैं ?

बाकी जो चीजें मिली उनपर फिलहाल चर्चा नहीं कर रहा हूँ,  प्रेशर कुकर बम की बात इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि प्रेशर कुकर छुपाने जैसी छोटी चीज नहीं होती।

तो यहाँ बात – कम से कम – परिवार के सहयोग की है।

यहाँ एक बात याद आती है – कश्मीर का दो साल पुराना विडियो था जहां भारतीय सेना का अधिकारी एक फरार मुस्लिम आतंकी के परिवार से बात करने आया है। वो उस मुस्लिम परिवार से कहता है कि हमें पता है वो आप से बात करता है, आप उसको मनाइए कि वो सरेंडर करें। हम उसके खून के प्यासे नहीं हैं,  लेकिन उसने सरेंडर न किया तो फिर आप को उसे खो देना होगा यह तय है।

उस मुस्लिम आतंकी की बहन और माँ कहती है कि वो सरेंडर करे इससे हम उसे शहीद देखना पसंद करेंगे, सरेंडर कर के घर लौटे तो हम ही उसे मारेंगे, वो अल्लाह के काम में निकला है,  हमें उसकी सरेंडर गंवारा नहीं। मुस्लिम आतंकी का बाप सर झुकाये बैठा है,  मौन सम्मति में।

और एक बात – जहां भी पुलिस किसी गुनहगार मुस्लिम को पकड़ने उसके मुस्लिम बहुल एरिया में जाती है तो किस तरह से पुलिस पर वहाँ के कई सारे मुस्लिम, भीड़ बनाकर टूट पड़ते हैं यह सब को ज्ञात है। हाल ही में दो विडियो वायरल भी हैं जहां एक मुस्लिम गुनहगार को पकड़ने गए UP पुलिस के दो  कर्मियों को वहाँ के मुसलमान उग्र भीड़ बनकर धमकाते हैं और उन्हें जान बचाकर वहाँ से जाना पड़ता है। फिर कुछ समय बाद भारी दल बल के साथ आ कर उसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाता है।

इस घटना को दो नजरियों से देखा जा सकता है। एक,  कि इतने दल बल के बिना एक सामान्य मुस्लिम गुनहगार को भी अरेस्ट नहीं किया जा सकता क्योंकि वहाँ उपस्थित मुस्लिम समाज का एक बड़ा हिस्सा उसके उग्र समर्थन में पुलिस को रोकता है,  तो यह एक बहुता ही दुखद स्थिति है। दूसरा नज़रिया मुस्लिम समाज में यह शान से कहा जाएगा कि उनके एरिया में आ कर अरेस्ट करना पुलिस के लिए भी डर की बात है।   यहाँ पुलिस और उनके बीच जो धार्मिक फर्क है उसे भी शान से उजागर किया जाएगा।

यहाँ मुझे  शबाना आज़मी का दुखड़ा याद आता है कि उनके कौम को अविश्वास से देखा जाता है।

क्या वाकई हम इनपर अविश्वास करते हैं या पूर्ण विश्वास करते हैं ? हाँ, किस बात पर पूर्ण विश्वास है इसपर मतभेद हो सकता है,  क्या नहीं ?

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