अफगानिस्तान में शरीयत कानून…

तालिबान का अफगानिस्तान में कब्जा हो चुका है।
99% गैर मजहबी वहाँ से पहले ही खत्म किये जा चुके हैं।
अब भी नरसंहार जारी है। परसों 22 अफगानों को मारा गया।
ये अफगानी सच्चे मोमिन नहीं है, हालांकि वे भारतीय मोमिनों से सीनियर हैं लेकिन दीक्षित होने की टाइमिंग और बोस की गाइडलाइंस से मेल नहीं खाते।
शरीयत कानून लागू हो रहा है।
चोरों के हाथ पैर काटे जाएंगे।
बिल्कुल पवित्र रीति से शासन चलेगा।
महिलाओं को पैर के अंगूठे तक ढंक कर रहना होगा और घर से बाहर पैर रखने के लिए एक दिन पहले ही अनुमति लेनी होगी।
4शादी, ttt और हलाला पुनः कायम होगा।
चार औरतों की गवाही एक पुरूष के बराबर होगी।
बुत, यानि बुद्ध की कोई मूर्ति वगैरह यदि बची हुई है तो उसे तोड़ा जाएगा।
अरुंधती, बुरखा और स्वरा आदि लिबरल औरतें जिस तौर तरीके से भारत में रहती हैं यदि वैसे आचरण से अफगानिस्तान में रही तो उनके लिए तालिबान की सजा यह है कि उन्हें गर्दन तक जमीन में गाड़कर ऊपर पत्थर मारे जाएंगे, तब तक, जब तक कि उनकी वहीं कब्र नहीं बन जाती।

जेएनयू के वे विद्यार्थी जो साड़ी- बिंदी में फोटो हिंचवा रहे हैं उन समलिंगियों के लिए दीवार गिराकर मारने की सजा मुक़र्रर है।
हरी चादर डालकर मजार के किनारे कटोरा लिए बैठे लोगों का काम भी उन विद्यार्थियों द्वारा पढ़ी गई किताब के मुताबिक घोर पाप है और ऐसे लोगों की बस्तियों को जलाकर, 18 साल से ऊपर के सभी मर्दों को मारकर उनकी औरतों को लौंडी बनाने और बच्चों को गुलाम बनाकर बेचने का प्रावधान है, शर्त यही है कि लूट के माल का पांचवा हिस्सा बोस को देना है और बाकी 80% लड़ाके आपस में बांट लेंगे।
कभी कभी लगता है कि आख़िरत आ रही है, बीच में फिर से कुछ समय के लिए पोस्टपोंड हो गई थी, अब फिर से कुछ सम्भावना बनी है। सच्चा मजहब फिर से उभर रहा है। चीन चिन्ता प्रकट कर रहा है जबकि पाकिस्तान खुश हो रहा है।

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